दिनी क़िलों की हिफाज़त जदीद तक़ाज़ों से हम-आहंगी में है: एम डब्ल्यू अंसारी – आई पी एस (रिटायर्ड। डी.जी) Click to teach Gmail this conversation is important

मदारिस-ए-इस्लामिया हमारी दीनी, तहज़ीबी और इल्मी पहचान के वो मज़बूत स्तून हैं जिन्होंने सदियों से ईमान की शमअ रौशन रखी है। ये महज़ तालीमी इदारे नहीं बल्कि दीन के क़िले, अख़लाक़ के मराकिज़ और मआशरती रहनुमाई के सरचश्मे हैं। बर्रे-सगीर की तारीख़ इस बात की गवाह है कि जब भी दीन व मिल्लत पर कोई मुश्किल वक़्त आया, मदारिस ने अपने किरदार से न सिर्फ़ हिफाज़त की बल्कि नई नस्ल को शऊर, इल्म और इस्तिक़ामत भी अता की।
लेकिन हर ज़िंदा निज़ाम की तरह मदारिस को भी वक़्त के तक़ाज़ों के मुताबिक़ ख़ुद को ढालने की ज़रूरत है। ये बात तस्लीम करने में कोई हरज नहीं कि मौजूदा दौर में कुछ ऐसे पहलू हैं जिन पर तवज्जो देना नाक़ाबिले-ग़फ़लत हो चुका है, ताकि मदारिस का वक़ार भी बरक़रार रहे और उनकी अफ़ादियत मज़ीद बढ़ सके। आज हुकूमत की जानिब से भी तालीमी व फ़लाही इदारों के लिए मुख्तलिफ़ उसूल, रहनुमा हिदायात और क़ानूनी तक़ाज़े मुक़र्रर किए जा रहे हैं। ऐसे में मदारिस के लिए ज़रूरी है कि वो अपनी पहचान और ख़ुद-मुख़्तारी बरक़रार रखते हुए इन ज़रूरी सरकारी तक़ाज़ों को पूरा करें जो शफ़ाफ़ियत, नज़्म व नसक़ और इदाराजाती मज़बूती के लिए लाज़िम समझे जाते हैं। ये तर्ज़-ए-अमल न सिर्फ़ मदारिस के तहफ्फुज़ का ज़रिया बनेगा बल्कि मआशरे में उनके वक़ार और एतमाद को भी मज़ीद मुस्तहकम करेगा।
सबसे अहम मसला शफ़ाफ़ियत (Transparency) का है। आज के दौर में जब हर इदारा अपने माली मामलात को वाज़ेह और मुनज़्ज़म रखता है, मदारिस के लिए भी ज़रूरी है कि वो अपनी आमद व ख़र्च की बाक़ायदा ऑडिट रिपोर्ट (Audit Report) तैयार करें। ये न सिर्फ़ एतमाद में इज़ाफ़ा करेगा बल्कि उन हज़रात के लिए भी इत्मिनान का बाइस होगा जो अपने सदक़ात व अतियात मदारिस को देते हैं। अगर हर मदरसा सालाना ऑडिट रिपोर्ट शाए करे और उसे अवाम के लिए दस्तियाब बनाए तो इससे बदगुमानियों का ख़ातिमा होगा और इदारे की साख मज़बूत होगी। इसके साथ-साथ मदारिस की क़ानूनी रजिस्ट्रेशन, ज़मीन के काग़ज़ात, इमारत से मुताल्लिक़ दस्तावेज़ात, ट्रस्ट या सोसाइटी के रिकॉर्ड, और हुकूमत की जानिब से वक़्तन-फ़वक़्तन जारी किए जाने वाले सर्कुलर्स व रहनुमा हिदायात पर अमल-दरआमद भी बेहद ज़रूरी है। एक मुनज़्ज़म और दस्तावेज़ी निज़ाम मदारिस को गैर-ज़रूरी एतराज़ात, क़ानूनी पेचीदगियों और इंतिज़ामी दुश्वारियों से महफूज़ रख सकता है।
इसी तरह अकाउंट मेंटेनेंस का जदीद निज़ाम अपनाना वक़्त की अहम ज़रूरत है। रिवायती रजिस्टरों के साथ-साथ डिजिटल अकाउंटिंग सिस्टम को शामिल किया जाए, ताकि रिकॉर्ड महफूज़ भी रहे और बवक़्त-ए-ज़रूरत आसानी से दस्तियाब भी हो। इससे माली नज़्म व नसक़ में बेहतरी आएगी और किसी भी क़िस्म की बेज़ाब्तगी के इमकानात कम होंगे।
मज़ीद बरआँ, मदारिस में टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल बढ़ाना भी निहायत ज़रूरी है। आज दुनिया डिजिटल (Digital) हो चुकी है, ऐसे में मदारिस अगर टेली सिस्टम, ऑनलाइन रिकॉर्ड, और डिजिटल कम्युनिकेशन को अपनाएं तो न सिर्फ़ उनका इंतिज़ामी निज़ाम बेहतर होगा बल्कि तलबा को भी जदीद तक़ाज़ों से हम-आहंग होने का मौक़ा मिलेगा। ऑनलाइन क्लासेज़, डिजिटल लाइब्रेरी, और ई-लर्निंग प्लेटफ़ॉर्म्स मदारिस के तालीमी मयार को एक नई जहत दे सकते हैं। कम्युनिकेशन सेंटर, जदीद साइंस, टेक्नोलॉजी वगैरह सब ही मदारिस को तक़वियत देने में मददगार हो सकते हैं।
एक और अहम पहलू सरकारी ज़वाबित और क़ानूनी तक़ाज़ों की पासदारी है। हक़ीक़त ये है कि हुकूमत की जानिब से मदारिस के तअल्लुक़ से जो एतराज़ात या शुकूक सामने आते हैं, उनमें अक्सर मामलात दस्तावेज़ी कमज़ोरी, गैर-मुनज़्ज़म रिकॉर्ड, गैर-वाज़ेह माली निज़ाम, या क़ानूनी तक़ाज़ों की अदम तकमील से जुड़े होते हैं। अगर मदारिस अपने तमाम मामलात शफ़्फ़ाफ़, मुनज़म और क़ानून के मुताबिक़ रखें तो न सिर्फ़ बहुत सी ग़लत-फ़हमियां ख़ुद-ब-खुद ख़त्म हो सकती हैं बल्कि मदारिस के ख़िलाफ़ पैदा होने वाली मनफ़ी फ़िज़ा को भी कम किया जा सकता है। वक़्त का तक़ाज़ा ये है कि मदारिस दिफ़ाई ज़ेहन के बजाय तामीरी और मुनज़्ज़म तर्ज़-ए-फ़िक्र अपनाएं, ताकि उनके ख़िलाफ़ उठने वाले सवालात का जवाब अमली तौर पर दिया जा सके।
इसके साथ-साथ निसाब में तवाजुन भी ज़रूरी है। दीनी उलूम के साथ बुनियादी असरी उलूम जैसे उर्दू, हिंदी, अंग्रेज़ी, रियाज़ी और कंप्यूटर की तालीम शामिल की जाए, ताकि फ़ारिग्रीन-ए-मदारिस न सिर्फ़ दीन के आलिम हों बल्कि मआशरे में बाक़ार रोज़गार के मौक़े भी हासिल कर सकें। इसके अलावा इलाक़ाई ज़बानों पर भी तवज्जो दी जानी चाहिए ताकि तलबा अपने मुक़ामी समाज और माहौल से बेहतर अंदाज़ में जुड़ सकें। मदारिस में उर्दू, अरबी और फ़ारसी रस्म-उल-ख़त (Rasm-ul-Khat) और ख़त्ताती (Calligraphy) की तालीम व तरबियत पर बड़े पैमाने पर खुसूसी तवज्जो दी जाए, क्योंकि ये सिर्फ़ ज़बान या फ़न नहीं बल्कि हमारी तहज़ीबी पहचान और इल्मी विरसे का अहम हिस्सा हैं। अगर मदारिस इस फ़न को जदीद अंदाज़ में फ़रोग़ दें तो नई नस्ल अपनी तहज़ीब, ज़बान और इल्मी रिवायत से मज़बूत तअल्लुक़ क़ायम रख सकेगी।
ये तमाम मशवरे मदारिस की रूह या मक़सद को तब्दील करने के लिए नहीं बल्कि उसे मज़ीद मज़बूत और मोअस्सिर बनाने के लिए हैं। हमें ये समझना होगा कि शफ़ाफ़ियत, नज़्म व ज़ब्त, और जदीद तक़ाज़ों को अपनाना दीन से दूरी नहीं बल्कि दीन की ख़िदमत का एक नया अंदाज़ है।
आख़िर में यही कहा जा सकता है कि मदारिस हमारे सरों के ताज हैं, और ताज को मज़ीद चमकदार बनाने के लिए उसकी देखभाल ज़रूरी है। अगर हमने बरवक़्त इस्लाहात को अपना लिया तो मदारिस न सिर्फ़ अपने माज़ी की शान बरक़रार रखेंगे बल्कि मुस्तक़बिल में भी दीन व मिल्लत की रहनुमाई का फ़रीज़ा भरपूर तरीके से अंजाम देते रहेंगे।
याद रखना चाहिए कि ज़माना बदल रहा है, सवालात बदल रहे हैं, और इदारों को परखने के पैमाने भी बदल चुके हैं। ऐसे में मदारिस के तहफ्फुज़ का रास्ता सिर्फ़ जज़्बाती नारों में नहीं बल्कि मज़बूत निज़ाम, शफ़ाफ़ किरदार, इल्मी वक़ार, क़ानूनी तैयारी और दूरअंदेश क़ियादत में पोशीदा है। जो इदारे वक़्त के तक़ाज़ों को समझ लेते हैं वही तारीख़ में ज़िंदा रहते हैं। मदारिस अगर अपनी दीनी रूह को बरक़रार रखते हुए नज़्म, शफ़ाफ़ियत, टेक्नोलॉजी, असरी शऊर और तहज़ीबी पहचान को साथ लेकर चलें तो वो न सिर्फ़ हर एतराज़ का जवाब बन सकते हैं बल्कि आने वाली नस्लों के लिए एक मिसाली, बाक़ार और नाक़ाबिले-शिकस्त तालीमी निज़ाम की सूरत इख़्तियार कर सकते हैं। यही वक़्त की आवाज़ है, यही मिल्लत की ज़रूरत है, और यही मदारिस के रौशन और महफूज़ मुस्तक़बिल की हक़ीक़ी ज़मानत है।

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