विज्ञापनों में बड़े दावे, जमीनी हकीकत पर सवाल

विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता से लेकर फीस और मरीज सुविधाओं तक, कॉन्टिनेंटल अस्पताल की व्यवस्थाओं पर उठ रहे सवाल

जगदलपुर, 5 अक्टूबर। बस्तर जैसे आदिवासी बहुल और दूरस्थ क्षेत्र में गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए बड़े शहरों पर निर्भरता कम करने की उम्मीद से डिमरापाल में शुरू किए गए कॉन्टिनेंटल अस्पताल को लेकर अब मरीजों और उनके परिजनों की शिकायतें चर्चा का विषय बनती जा रही हैं। अस्पताल की ओर से अत्याधुनिक चिकित्सा सुविधाओं और विशेषज्ञ उपचार के बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन गंभीर परिस्थितियों में इन सुविधाओं की वास्तविक उपलब्धता को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।

एनएमडीसी के सहयोग से तैयार इस अस्पताल से बस्तरवासियों को उम्मीद थी कि गंभीर बीमारी की स्थिति में उन्हें रायपुर, विशाखापट्टनम या अन्य बड़े शहरों का रुख नहीं करना पड़ेगा। हालांकि, मरीजों की ओर से सामने आ रही शिकायतों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की उपलब्धता, उपचार की प्रक्रिया, शुल्क, बिलिंग और अन्य सुविधाओं को लेकर असंतोष की बातें कही जा रही हैं।

इसी बीच चित्रकोट विधानसभा क्षेत्र के पूर्व विधायक और वरिष्ठ भाजपा नेता लच्छूराम कश्यप से जुड़ा मामला भी सामने आया है। बीती रात तबीयत बिगड़ने पर वे कॉन्टिनेंटल अस्पताल पहुंचे। बताया जा रहा है कि आवश्यक विशेषज्ञ उपचार उपलब्ध नहीं होने के कारण उन्हें बाद में डिमरापाल मेडिकल कॉलेज ले जाना पड़ा। परिजनों के अनुसार अस्पताल में गैस्ट्रोएंटेरोलॉजी, न्यूरोलॉजी, कार्डियोलॉजी और नेफ्रोलॉजी जैसे विभागों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की तत्काल उपलब्धता नहीं थी।

यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि यदि गंभीर स्थिति में अस्पताल पहुंचने वाले मरीज को जरूरी विशेषज्ञ उपचार के लिए दूसरे अस्पताल जाना पड़े, तो फिर उस अस्पताल की विशेषज्ञ चिकित्सा व्यवस्था और उसके प्रचारित दावों के बीच अंतर पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

विज्ञापन और व्यवस्था के बीच कितना अंतर?

किसी भी बड़े अस्पताल की पहचान केवल उसकी इमारत, मशीनों और प्रचार से नहीं होती। असली परीक्षा उस समय होती है जब कोई मरीज गंभीर हालत में अस्पताल पहुंचता है और उसे तत्काल विशेषज्ञ उपचार की जरूरत होती है। ऐसे समय में डॉक्टर, जांच सुविधा, आपातकालीन सेवाएं और उपचार की पूरी व्यवस्था उपलब्ध होना सबसे महत्वपूर्ण है।

कॉन्टिनेंटल अस्पताल को लेकर भी यही सवाल सामने आ रहा है कि क्या यहां विज्ञापनों में बताए जा रहे सभी विशेषज्ञ उपचार वास्तव में जरूरत के समय मरीजों को उपलब्ध हो पाते हैं? यदि कुछ सेवाएं केवल सीमित समय या निर्धारित चिकित्सकों की उपलब्धता पर निर्भर हैं, तो अस्पताल प्रबंधन को इसकी स्पष्ट जानकारी मरीजों और उनके परिजनों को देनी चाहिए।

फीस और बिलिंग को लेकर भी सवाल

मरीजों और उनके परिजनों की ओर से इलाज की लागत, बिलिंग प्रक्रिया, उपचार के दौरान होने वाले खर्च और डिस्चार्ज प्रक्रिया को लेकर भी समय-समय पर शिकायतें सामने आने की बात कही जा रही है। गंभीर बीमारी से जूझ रहे परिवार के लिए इलाज का खर्च पहले ही बड़ी चिंता होता है। ऐसे में यदि उपचार की लागत को लेकर स्पष्टता नहीं हो या मरीज को अपेक्षित सुविधा नहीं मिले, तो परेशानी और बढ़ जाती है।

बस्तर के लोगों के लिए यह सिर्फ किसी एक अस्पताल का मामला नहीं है। यहां स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता का सीधा संबंध लोगों की आर्थिक क्षमता और भौगोलिक परिस्थितियों से भी है। जगदलपुर से बाहर इलाज के लिए जाना कई परिवारों के लिए अतिरिक्त खर्च, समय और जोखिम लेकर आता है। इसलिए स्थानीय स्तर पर स्थापित बड़े अस्पतालों से लोगों की अपेक्षाएं भी स्वाभाविक रूप से अधिक हैं।

जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर भी सवाल

अब सवाल अस्पताल प्रबंधन के साथ-साथ स्थानीय जनप्रतिनिधियों से भी है। यदि मरीजों और उनके परिजनों की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं, तो क्या संबंधित जनप्रतिनिधियों ने अस्पताल प्रबंधन से इन शिकायतों पर जवाब मांगा है? क्या अस्पताल में उपलब्ध विशेषज्ञ सेवाओं, शुल्क संरचना और मरीज सुविधाओं की वास्तविक स्थिति की समीक्षा हुई है?

बस्तर को बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था की जरूरत है, केवल बड़े-बड़े दावों की नहीं। कॉन्टिनेंटल अस्पताल से लोगों को उम्मीद इसलिए थी कि गंभीर इलाज के लिए बाहर जाने की मजबूरी कम होगी। ऐसे में अस्पताल की सेवाओं को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब पारदर्शिता के साथ सामने आना चाहिए।

लच्छूराम कश्यप का मामला भी इसी बड़े सवाल की ओर इशारा करता है—जब गंभीर बीमारी के समय जरूरी विशेषज्ञ उपचार उपलब्ध न हो, तो बस्तर का आम मरीज आखिर किस भरोसे पर बड़े अस्पताल का रुख करे?

अब जरूरत आरोप-प्रत्यारोप की नहीं, बल्कि अस्पताल की वास्तविक विशेषज्ञ सेवाओं, शुल्क व्यवस्था और मरीज सुविधाओं की निष्पक्ष समीक्षा की है। बस्तर के लोगों को ऐसा स्वास्थ्य तंत्र चाहिए, जहां विज्ञापन में किए गए दावे और अस्पताल की वास्तविक सेवाओं के बीच कोई बड़ा अंतर न हो।

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