जगदलपुर। छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित झीरम घाटी नरसंहार मामले में करीब 13 साल बाद शनिवार को बड़ा न्यायिक फैसला आया। जगदलपुर स्थित विशेष NIA अदालत ने मामले में सुनवाई का सामना कर रहे सभी 10 आरोपियों पर दोष सिद्ध किया है। लंबे समय से चल रहे इस मामले में अंतिम बहस पूरी होने के बाद अदालत ने फैसला सुरक्षित रखा था। पहले 31 अगस्त को निर्णय सुनाया जाना था, जिसे बढ़ाकर 5 सितंबर किया गया था।
25 मई 2013 को कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा सुकमा से जगदलपुर लौट रही थी। दरभा क्षेत्र की झीरम घाटी में नक्सलियों ने काफिले को घेरकर हमला किया था। विस्फोट के बाद हुई गोलीबारी में कांग्रेस के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, उनके पुत्र दिनेश पटेल, बस्तर टाइगर महेंद्र कर्मा, पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल और कांग्रेस नेता उदय मुदलियार समेत कई लोग मारे गए थे।न्यायिक रिकॉर्ड के अनुसार इस घटना में 27 लोगों की मौत और 38 लोग घायल हुए थे। झीरम हमला छत्तीसगढ़ के राजनीतिक इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में शामिल है।
घटना की प्रारंभिक जांच के बाद मामला राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) को सौंपा गया था। NIA ने 25 सितंबर 2014 को विशेष अदालत में चार्जशीट दाखिल की थी। जांच एजेंसी ने हमले में प्रतिबंधित CPI (Maoist) के विभिन्न कैडरों और सैन्य इकाइयों की भूमिका का आरोप लगाया था।
मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने बड़ी संख्या में दस्तावेज और साक्ष्य पेश किए। 101 गवाहों के बयान अदालत में दर्ज किए गए।
अदालत में जिन 10 आरोपियों के खिलाफ मुकदमा चला, उनके नाम हैं—
1. प्रमिला मोडियम
2. चैतू लेकाम उर्फ मुन्ना
3. सुमित्रा उर्फ सुमित्रा पुनेम मोडियम
4. मुक्का मंडवी
5. कोसा कवासी उर्फ कोसाराम
6. आयाता मरकाम
7. मड़कमि देवा
8. जोगा मड़कमि
9. बंजामी सन्ना उर्फ चमरू उर्फ देंगा
10. महादेव नाग
आरोपियों की ओर से अधिवक्ता अरविंद चौधरी ने पैरवी की।
कई गंभीर धाराओं में चला मुकदमा
मामले में IPC की धारा 147, 148, 149, 341, 121, 121-A, 122, 307, 302, 427, 396, 397 और 120-B के तहत आरोप लगाए गए थे।
इसके अलावा Arms Act की धारा 25 और 27, Explosive Substances Act की धारा 3, 4 और 5 तथा UAPA की धारा 16, 18, 20, 38(2), 39(2) और 40(2) के तहत भी अभियोजन चलाया गया।
अदालत द्वारा सभी 10 आरोपियों पर दोष सिद्ध किए जाने के बाद अब सजा कितनी और किन धाराओं के तहत सुनाई जाएगी, इस पर नजर है। अदालत के विस्तृत आदेश से यह स्पष्ट होगा कि दोष सिद्ध करने के लिए किन साक्ष्यों और कानूनी आधारों को महत्वपूर्ण माना गया। करीब 13 साल बाद आया यह फैसला झीरम घाटी नरसंहार की न्यायिक प्रक्रिया में महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है। हालांकि घटना की पूरी साजिश, हमले में शामिल अन्य लोगों और सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े कई सवाल आज भी सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बने हुए हैं।