खेलों के ज़रिए एकता और भाईचारे को बढ़ावा देना वक्त की अहम ज़रूरतः एम. डब्ल्यू. अंसारी (IPS रिटायर्ड, डीजी)

आज का दिन दुनिया भर में वर्ल्ड एथलेटिक्स डे के तौर पर मनाया जाता है, जिसका मकसद नौजवानों को खेलों की तरफ़ राग़िब करना और एक सेहतमंद, पॉज़िटिव और पुरअमन समाज बनाना है। लेकिन अगर हम गहराई से देखें तो खेल सिर्फ़ जिस्मानी मज़बूती का ज़रिया नहीं, बल्कि यह दिलों को जोड़ने, नफ़रत को ख़त्म करने और मोहब्बत को बढ़ावा देने का एक ताक़तवर ज़रिया भी हैं।
खेल के मैदान में न कोई जात पूछी जाती है, न मज़हब, न ज़बान और न ही रंग। वहाँ सिर्फ काबिलियत, मेहनत और जज़्बा देखा जाता है। यही वह खूबसूरती है जो खेल को समाज में एकता और भाईचारे का सबसे बड़ा ज़रिया बनाती है। खेल के मैदान में न सियासी रक़ाबत (Political Rivalry) की गुंजाइश होती है, न नज़रीयाती इख़्तिलाफ़ (Ideological Rivalry) दीवार बनते हैं, न इलाक़ाई तअस्सुब (Regional Rivalry) सर उठाता है और न ही मज़हबी रक़ाबत (Religious Rivalry) कोई मायने रखती है। वहाँ अगर कुछ अहम है तो सिर्फ़ खेल का जज़्बा, टीम स्पिरिट और एक-दूसरे के लिए एहतराम।
जब एक टीम मैदान में उतरती है तो उसके खिलाड़ी मुख्तलिफ़ बैकग्राउंड से होने के बावजूद एक ही मकसद के लिए खेलते हैं- जीत और इज़्ज़त। यही सबक अगर हम अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में अपना लें तो कई सामाजिक बुराइयाँ खुद-ब-खुद ख़त्म हो सकती हैं।
हमारे समाज में आज नफ़रत, तअस्सुब और तफ़रके की जो फ़िज़ा बनती जा रही है, उसके मुक़ाबले में खेल एक उम्मीद की किरण बनकर सामने आते हैं। एक फुटबॉल, एक क्रिकेट मैच या एक दौड़ का मुकाबला लोगों को क़रीब लाता है, अजनबियों को दोस्त बनाता है और दिलों में मोहब्बत का बीज बोता है।
हक़ीक़त यह है कि खेल सिर्फ़ मेडल जीतने का नाम नहीं, बल्कि यह किरदारसाज़ी, बर्दाश्त, अनुशासन और आपसी एहतराम सिखाते हैं। यह वह क़ीमतें हैं जिनकी आज हमारे समाज को सबसे ज़्यादा ज़रूरत है।
आइए, इस वर्ल्ड एथलेटिक्स डे के मौके पर हम अहद करें कि खेलों को सिर्फ़ तफ़रीह नहीं, बल्कि सामाजिक हमआहंगी और मोहब्बत को बढ़ावा देने का ज़रिया बनाएँगे। हम अपने बच्चों को यह सिखाएँगे कि असली जीत दूसरों को हराना नहीं, बल्कि दिलों को जीतना है। खेल हमें सिखाते हैं कि जीत सिर्फ मैदान में नहीं, बल्कि इंसानियत के दिल जीतने में है।

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