दंतेवाड़ा. बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी की डोली शारदीय नवरात्र की अष्टमी तिथि पर ऐतिहासिक बस्तर दशहरा में शामिल होने के लिए रविवार को पूरे विधि-विधान और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ दंतेवाड़ा से जगदलपुर के लिए रवाना हुई। माता की विदाई के इस पावन अवसर पर मंदिर परिसर से लेकर नगर के प्रमुख मार्गों तक श्रद्धा, भक्ति और उत्साह का माहौल रहा। भव्य रथ पर सवार मां दंतेश्वरी की डोली के दर्शन के लिए हजारों श्रद्धालु उमड़े। जगह-जगह सशस्त्र जवानों ने हर्ष फायर कर माता को सलामी दी और श्रद्धालुओं ने सुख-समृद्धि, खुशहाली तथा बस्तर की शांति के लिए प्रार्थना की।
मां दंतेश्वरी की जगदलपुर यात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि बस्तर की सदियों पुरानी राजवंशीय परंपरा, सांस्कृतिक विरासत और जनआस्था का प्रतीक है। ऐतिहासिक बस्तर दशहरा में दंतेश्वरी माता की सहभागिता का विशेष महत्व है। पीढ़ियों से चली आ रही इस परंपरा में माता की डोली का दंतेवाड़ा से जगदलपुर प्रस्थान बस्तर की सांस्कृतिक एकता और परंपराओं के प्रति अटूट श्रद्धा को दर्शाता है।परंपरा के अनुसार, इस वर्ष भी पंचमी तिथि को बस्तर राजपरिवार दंतेवाड़ा पहुंचा था। राजपरिवार ने मां दंतेश्वरी को ऐतिहासिक दशहरा पर्व में शामिल होने के लिए विधिवत निमंत्रण दिया। सदियों से निभाई जा रही इस राजवंशीय परंपरा के तहत माता को दशहरा में आमंत्रित किया जाता है। इसके बाद निर्धारित तिथि पर पूरे विधि-विधान के साथ माता की डोली को जगदलपुर के लिए विदा किया जाता है। यह परंपरा बस्तर की धार्मिक मान्यताओं और राजपरिवार तथा आराध्य देवी के बीच ऐतिहासिक संबंधों की जीवंत पहचान है।
मंदिर परिसर से रवाना हुई माता की डोली को नगर के प्रमुख स्थानों पर परंपरानुसार ठहराया गया। जयस्तंभ चौक स्थित बाबा बोदराज और घाट भैरम शिला के पास डोली को रोककर निर्धारित रस्में पूरी की गईं। इस दौरान नगर का भार बाबा बोदराज को सौंपने की परंपरा निभाई गई। इसके बाद मां दंतेश्वरी और मावली माता की डोली आगे की यात्रा के लिए रवाना हुई। इन परंपराओं के माध्यम से नगर की धार्मिक मान्यताओं और सदियों से चली आ रही लोक आस्था का निर्वहन किया गया।