बस्तरः एक नई भोर की कहानी

बीजापुर 03 मई।  एक नई भोर हुई है यहाँ, जहाँ अब तितलियाँ फूलों पर बेखौफ बैठेंगी। भँवरे खुली हवा में गीत गुनगुनाएँगे, बच्चों की खिलखिलाहट से तेंदू की मिठास और बढ़ जाएगी, स्त्रियों की हँसी जंगल को ठूँठ होने से बचा लेगी, ताड़ी, सल्फी से लबालब भरा रहेगा तूम्बा। बूढ़ा देव की जात्रा में तिरडुडडी की खनक बढ़ जाएगी। महुआ की गंध से महकने लगेगा हमारे मन का मौसम। स्कूल की घंटी अब टन-टन बजेगी, किताबों के भीतर की कहानियों के पात्र लौटकर आएँगे असल ज़िंदगी में रंग भरने को। एक ऐसी दुनिया का हिस्सा बनने की पूरी तैयारी है जहाँ बिजली, पानी, स्वास्थ्य के साथ-साथ रोजगार के बेहतर विकल्प होंगे। जहाँ हम होंगे, जीवन होगा और होगी हर रोज़ नई भोर की नई-नई कहानियाँ।

बस्तर की साहित्यकार पूनम वासम ने बताया कि नक्सलवाद को खतम करना इतना आसान नहीं था। वर्षों से खूनी संघर्ष की आग में बस्तर के लोग अपना लहू बहाते आ रहे हैं, फिर भी अपनी मिट्टी की खुशबू, अपनी संस्कृति की महक और अपने लोगों की आत्मा को कभी नहीं छोड़ा। बस्तर छत्तीसगढ़ का वह हृदय है, जहाँ 40 साल से ज़्यादा समय तक नक्सलवाद ने हिंसा, भय, गरीबी, भुखमरी और पिछड़ेपन की दीवार खड़ी कर रखी थी। जंगलों में छिपी बंदूकें, गाँवों में फैला डर, बच्चों के अधूरे सपने, महिलाओं की चुप्पी और आदिवासी सोमारू की चीखती हुई आत्मा, यही सब बस्तर की हकीकत थी, लेकिन मार्च 2026 में इतिहास रच दिया गया। केंद्र और राज्य सरकार की “डबल इंजन” नीति, सुरक्षा बलों की अथक मेहनत, स्थानीय आदिवासियों का अटूट विश्वास और बस्तर की मिट्टी की वह अनकही जिजीविषा इन सबके कारण बस्तर नक्सलमुक्त हो गया है।

जब मन पीड़ा से भरा हुआ रहता था, जब आईईडी, बम-बारूद और बंदूक की गोलियों से बच्चों की देह जख्मी हो जाती थी या तड़प-तड़प कर बिना इलाज उनकी दर्दनाक मौत हो जाती थी, तब मन चीखकर रह जाता था। दुःख को व्यक्त करने के लिए कविताओं से अच्छा सहारा कुछ और नहीं हो सकता था। कविताएँ दिलासा दिलाती थीं कि एक दिन सब कुछ अच्छा होगा। ऐसी उम्मीद से मैं हर रोज़ सोमारू को प्रेम पत्र लिखा करती थी कि लौट आओ सोमारू, यह जमीन तुम्हारी है, यह आकाश तुम्हारा है, यह जंगल तुम्हारा है, यहाँ के लोग तुम्हारे अपने लोग हैं। अपनों पर भला कोई गोली कैसे दाग सकता है, अपनों की देह के उड़ते चिथड़े भला कोई अपनी ही आँखों से कैसे देख सकता है।

उन्होंने बताया कि नक्सलवाद के खात्मे के साथ अधिक से अधिक सुरक्षा कैंप अब अस्पतालों, स्कूलों, कौशल केंद्रों और सामुदायिक केंद्रों में बदल रहे हैं। अबूझमाड़, उत्तर बस्तर, दक्षिण बस्तर, दंतेवाड़ा, बीजापुर, पूरा का पूरा बस्तर नक्सलमुक्त हो चुका है। अब यहाँ बंदूकों की गूँज नहीं, विकास की धड़कन सुनाई दे रही है। जहाँ कभी गोली की आवाज आती थी, आज वहाँ स्कूल की घंटी की आवाज आती है। बच्चे स्कूल जा रहे हैं, उनके सपने उड़ान भरने की तैयारी में लग गए हैं, और जंगल अब शांति का गीत गा रहा है। स्त्रियाँ लोकगीतों में अपनी अस्मिता, अपनी ताकत और अपनी एकजुटता के साथ-साथ अपने उन परिजनों को याद कर रही हैं जिन्होंने इस आज़ादी के सपने देखे थे। देश को आज़ाद हुए इतने वर्ष बीत जाने के बाद यदि देश के किसी हिस्से में आज़ादी की लड़ाई अब तक लड़ी जा रही थी, तो यह स्थिति अपने आप में नक्सलवाद की कुरीतियों व उसके द्वारा की गई हिंसा तथा कुपाठ का एक पूरा महाकाव्य रचने के लिए पर्याप्त है।

अब जब पीछे पलटकर देखती हूँ तो पाती हूँ कि “हर गाँव में एक स्कूल” अभियान पूरे जोरों पर चल रहा है। डिजिटल क्लासरूम, स्मार्ट स्कूल, लाइब्रेरी और उच्च शिक्षा के केंद्र खुल रहे हैं। आदिवासी लड़कियों की शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। हर स्कूल में गोंडी भाषा, लोककथाएँ और स्थानीय ज्ञान को भी जगह दी जा रही है। जिस जंगल में कभी अँधेरा छाया रहता था, जहाँ बारूद और दर्दभरी चीखें सुनाई देती थीं, अब वहाँ जीवन पटरी पर लौट रहा है, मुस्कुरा रहा है। वहाँ अब किताबों की रोशनी फैल रही है, लड़कियाँ सपनों की उड़ान भर रही हैं, और बस्तर का भविष्य अब नई पीढ़ी के हाथों में है, जिन्हें बेहतर शिक्षा, बेहतर परिवेश, बेहतर स्वास्थ्य और बेहतर सुविधाएँ देने के लिए शासन प्रतिबद्ध है।

पूर्व सुरक्षा कैंप अब आधुनिक अस्पतालों में बदल रहे हैं। मोबाइल हेल्थ यूनिट, आयुष्मान भारत, मातृत्व एवं पोषण केंद्र और मानसिक स्वास्थ्य काउंसलिंग सेवाएँ हर गाँव तक पहुँच रही हैं। सड़क, बिजली, नल का पानी और ब्रॉडबैंड का जाल बिछ रहा है। महुआ, तेंदू, बांस, हर्बल उत्पाद, जैविक खेती और हस्तशिल्प पर आधारित उद्योग तेज़ी से विकसित हो रहे हैं। सरेंडर नक्सलियों को सम्मानजनक पुनर्वास और रोजगार मिल रहा है। राइफल अब हल में बदल रही है। महुआ अब लघु उद्योग में बदलने को तनकर खड़ा है। जिस मिट्टी ने खून पिया था, जिस मिट्टी पर युद्ध लड़ा गया था अपनी आज़ादी का, आज वही मिट्टी खुली हवा में चौन की साँस ले रही है। वही मिट्टी समृद्धि का इतिहास रचने को पहली सीढ़ी पर अपना कदम रख चुकी है। बस्तर अब इको-टूरिज्म, सांस्कृतिक पर्यटन और बस्तर ओलंपिक का नया केंद्र बनने की ओर बढ़ रहा है।

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