नौ दिनों की साधना के बाद जोगी उठाई की रस्म संपन्न
जगदलपुर।
विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा की ऐतिहासिक और अनूठी परंपराओं के बीच मंगलवार, 20 अक्टूबर की देर शाम दंतेवाड़ा से जगदलपुर पहुंचीं मावली माता का बस्तरवासियों ने भव्य स्वागत किया। मावली परघाव की पारंपरिक रस्म में जनप्रतिनिधियों, बस्तर राजपरिवार के सदस्यों, पुजारियों, सेवादारों और बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। माता की डोली के आगमन के साथ ही मां दंतेश्वरी मंदिर परिसर भक्तिमय वातावरण और जयकारों से गूंज उठा।
मावली माता के स्वागत के लिए गीदम मार्ग से लेकर मां दंतेश्वरी मंदिर तक सड़क के दोनों ओर श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगी रहीं। जैसे ही माता की डोली पहुंची, श्रद्धालुओं ने पुष्पवर्षा कर उनका अभिनंदन किया। इस अलौकिक दृश्य का साक्षी बनने के लिए बड़ी संख्या में लोग उमड़े। श्रद्धालुओं की भीड़ को देखते हुए मार्ग पर सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए थे।
जियाडेरा से मंदिर तक निकली पारंपरिक यात्रा
मावली परघाव की रस्म के तहत दंतेवाड़ा से माता की डोली के साथ आए पुजारी और सेवादार गीदम मार्ग स्थित जियाडेरा से पदयात्रा करते हुए मां दंतेश्वरी मंदिर पहुंचे। परंपरानुसार संजय बाजार के निकट कुटरूबाड़ा के सामने बस्तर राजपरिवार के उत्तराधिकारी कमलचंद्र भंजदेव ने माता की डोली का स्वागत एवं पूजन किया। इसके बाद विधि-विधान के साथ डोली को मां दंतेश्वरी मंदिर लाया गया, जहां पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार माता का अभिनंदन किया गया।
दशहरा का ई बुक पढ़िए विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा
दंतेवाड़ा स्थित मां दंतेश्वरी शक्तिपीठ के प्रधान पुजारी के अनुसार, मावली माता के प्रतीक स्वरूप को तैयार करने की भी विशिष्ट परंपरा है। नए वस्त्र पर चंदन का लेप लगाकर माता का प्रतिरूप बनाया जाता है। इसके बाद उसे फूलों से सजाकर डोली में विराजित किया जाता है। इसी प्रतिरूप को मावली माता के स्वरूप में दंतेवाड़ा से जगदलपुर लाया जाता है। यह परंपरा बस्तर दशहरा की धार्मिक आस्था और सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
नए धान के साथ जुड़ी कृषि संस्कृति की परंपरा
मावली माता की डोली के साथ नए धान का आगमन भी इस परंपरा का महत्वपूर्ण पक्ष है। माता के साथ लाए गए नए अन्न से 22 अक्टूबर को कुम्हड़ाकोट में बस्तर राजपरिवार द्वारा नवाखानी पर्व मनाया जाएगा। नवाखानी की यह परंपरा नई फसल के प्रति कृतज्ञता, कृषि संस्कृति और देवी-आस्था के गहरे संबंध को दर्शाती है। बस्तर के जनजीवन में धान केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक और धार्मिक परंपराओं का भी अभिन्न अंग है।नवाखानी के माध्यम से नई फसल को देवी-देवताओं के प्रति समर्पित करने और उसके बाद ग्रहण करने की परंपरा निभाई जाती है। इस तरह बस्तर दशहरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि यहां की कृषि परंपराओं, सामुदायिक जीवन और लोकविश्वासों को एक सूत्र में पिरोने वाला उत्सव भी है।
नौ दिनों की साधना के बाद संपन्न हुई जोगी उठाई विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा की एक और विशिष्ट धार्मिक रस्म जोगी उठाई भी परंपरानुसार सिरहासार भवन में विधि-विधान के साथ संपन्न हुई। नौ दिनों तक निर्जला उपवास रखकर साधना में लीन रहे जोगी को समारोहपूर्वक और ससम्मान उठाया गया। इस रस्म के साथ बस्तर दशहरा के महत्वपूर्ण धार्मिक विधानों में एक और परंपरा पूरी हुई।
जोगी उठाई बस्तर दशहरा की उन विशिष्ट रस्मों में शामिल है, जो इस उत्सव को देश के अन्य दशहरा आयोजनों से अलग पहचान देती हैं। यह परंपरा साधना, संकल्प और देवी के प्रति समर्पण का प्रतीक मानी जाती है। बस्तर दशहरा की विभिन्न रस्में अलग-अलग चरणों में संपन्न होती हैं और प्रत्येक रस्म का अपना धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व है।
परंपरा और आस्था का अनूठा संगम है बस्तर दशहरा
बस्तर दशहरा देश के सबसे लंबे समय तक चलने वाले दशहरा उत्सवों में गिना जाता है। इसकी विशेषता यह है कि यह पर्व भगवान श्रीराम की रावण पर विजय के प्रसंग के बजाय मुख्य रूप से मां दंतेश्वरी की आराधना, बस्तर की आराध्य देवी के प्रति समर्पण और स्थानीय जनजातीय परंपराओं पर केंद्रित है। इसकी ऐतिहासिक परंपरा बस्तर राजपरिवार और क्षेत्र की विभिन्न जनजातियों के सामूहिक योगदान से विकसित हुई है।
इस उत्सव में पाट जात्रा, डेरी गड़ाई, काछनगादी, जोगी उठाई, मावली परघाव, भीतर रैनी, बाहर रैनी और मुरिया दरबार जैसी रस्में विशेष महत्व रखती हैं। इन अनुष्ठानों में धार्मिक आस्था के साथ-साथ बस्तर की लोकसंस्कृति, सामुदायिक सहभागिता और ऐतिहासिक परंपराओं की झलक देखने को मिलती है।
मावली माता का जगदलपुर आगमन बस्तर दशहरा के सबसे भावनात्मक और महत्वपूर्ण पड़ावों में से एक है। इस अवसर पर उमड़ने वाली श्रद्धालुओं की भीड़ यह बताती है कि बस्तरवासियों के लिए दशहरा केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि उनकी सांस्कृतिक पहचान, देवी के प्रति अटूट श्रद्धा और पीढ़ियों से चली आ रही विरासत का प्रतीक है।