बस्तर की सड़कों पर दौड़ा जुनून, बस्तर हेरिटेज मैराथन में धावकों ने रचा इतिहास

जगदलपुर, 22 मार्च . बस्तर की पावन धरा पर आयोजित ‘बस्तर हेरिटेज मैराथन’ ने खेल और संस्कृति के एक अनूठे संगम को विश्व पटल पर अंकित कर दिया है। भोर की पहली किरण के साथ ही बस्तर की सड़कें धावकों के कदमों की ताल से गूंज उठीं, जहाँ स्थानीय युवाओं से लेकर अंतरराष्ट्रीय एथलीटों ने अपनी रफ़्तार और जज्बे का शानदार प्रदर्शन किया। इस आयोजन ने न केवल क्षेत्र की खेल प्रतिभाओं को एक मंच प्रदान किया, बल्कि ‘बस्तर की बदलती तस्वीर’ का संदेश भी पूरी दुनिया को दिया।

बस्तर हेरिटेज मैराथन के सबसे प्रतिष्ठित और चुनौतीपूर्ण पड़ाव यानी फुल मैराथन (42.195 किमी) के ओपन पुरुष वर्ग में इथियोपियाई मूल के धावकों का दबदबा देखने को मिला, जहाँ टेडेजे किनेटो वाशे ने मात्र 02:26:49 के अविश्वसनीय समय के साथ स्वर्ण पदक अपने नाम किया। इसी श्रेणी में महिलाओं के ओपन वर्ग में मेसेरेट मेंगिस्तु ने 02:41:50 का समय लेकर प्रथम स्थान प्राप्त किया। गौरवान्वित करने वाली बात यह रही कि बस्तर के स्थानीय धावकों ने भी अंतरराष्ट्रीय स्तर की चुनौती को बखूबी स्वीकार किया। ‘फुल मैराथन बस्तर पुरुष’ वर्ग में संजय कोर्राम ने 02:31:50 में दौड़ पूरी कर जीत का परचम लहराया, वहीं स्थानीय महिला वर्ग में कुसुम शार्दुल ने 03:18:43 के समय के साथ शीर्ष स्थान हासिल कर बस्तर का मान बढ़ाया।

प्रतिस्पर्धा का रोमांच हाफ मैराथन (21 किमी) में भी चरम पर रहा, जहाँ पुरुष ओपन वर्ग में मोनू कुमार ने 01:05:31 की तूफानी रफ़्तार से पहला स्थान हासिल किया, जबकि महिला ओपन वर्ग में त्सेहे देसाले 01:17:40 के साथ विजेता बनीं। बस्तर के ही बेटे भावेष कुमार और बेटी कुमली पोयाम ने हाफ मैराथन के स्थानीय कोटे में क्रमशः पुरुष और महिला वर्ग में बाजी मारी, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि बस्तर के जंगलों और पहाड़ों में पलने वाली प्रतिभा अब वैश्विक मानकों को छूने के लिए तैयार है। वहीं दूसरी ओर, 10 किलोमीटर की श्रेणी में 18 वर्ष से ऊपर के वयस्कों के बीच बबलू (00:28:43) और पूनम (00:34:56) ने अपनी श्रेणी में सबसे तेज दौड़ लगाकर दर्शकों की खूब तालियां बटोरीं। इस मैराथन की सबसे सुखद तस्वीर भविष्य के सितारों ने पेश की। 18 वर्ष से कम आयु के जूनियर वर्ग में सागर और लावण्या ने अपनी श्रेणी में जीत हासिल की, जबकि सब-जूनियर श्रेणी में मोहित धोंडू और अंजलि गुप्ता जैसे नन्हे धावकों के कदमों ने यह साबित कर दिया कि आने वाले समय में बस्तर से ओलंपिक जैसे मंचों के लिए धावक तैयार हो रहे हैं। यह मैराथन केवल एक दौड़ नहीं थी, बल्कि बस्तर की विरासत, साहस और विकास की नई उड़ान का जीवंत प्रमाण बनकर उभरी है।

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