बस्तर दशहरा: पीढ़ियों से रथ बनाने वाले कारीगरों की उपेक्षा, बोले—अब बाहर रैनी में नहीं आएंगे

जगदलपुर / फूल रथ और विजय रथ का निर्माण पीढ़ियों से बेड़ाउमरगांव और झारउमरगांव के कारीगर करते आ रहे हैं। ये कारीगर बस्तर दशहरा की महत्वपूर्ण परंपराओं के तहत पाट जात्रा से लेकर बाहर रैनी और मुरिया दरबार के संपन्न होने तक रथ की देखरेख और सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाते हैं। लेकिन अब यही पारंपरिक कारीगर उपेक्षा और सम्मान की कमी से नाराज हैं।

झारउमरगांव के कारीगर बलदेव बघेल और उनके साथियों ने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि वे पीढ़ियों से मां दंतेश्वरी की सेवा में रथ निर्माण का कार्य करते आ रहे हैं। ऐसे में राष्ट्रपति का बस्तर आगमन उनके लिए गौरव की बात है, लेकिन वीआईपी दौरे के नाम पर धार्मिक और पारंपरिक विधान पूरे होने से पहले ही उन्हें जबरन गांव भेजा जा रहा है।

 

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कारीगरों का आरोप है कि पिछले दो वर्षों से उन्हें मुरिया दरबार में शामिल होने के लिए पास तक नहीं दिया गया। वहीं, पिछले साल 145 कारीगरों को विदाई के नाम पर मात्र 10-10 हजार रुपये दिए गए। इस पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा,

क्या हमारी मेहनत की यही कीमत है?

कारीगरों ने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा कि वे पीढ़ियों से बस्तर दशहरा की परंपरा को निभाते हुए रथ निर्माण और उसकी सुरक्षा करते आ रहे हैं, लेकिन उन्हें अपेक्षित सम्मान नहीं मिल रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि उनकी मेहनत और परंपरागत भूमिका का सम्मान नहीं किया गया, तो अब बाहर रैनी के दौरान रथ की देखरेख के लिए वे नहीं आएंगे।

कारीगरों की इस नाराजगी ने बस्तर दशहरा की सदियों पुरानी परंपरा, उससे जुड़े पारंपरिक सेवकों के सम्मान और उनकी भूमिका को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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