सत्ता में रहते सबूत नहीं दिखे, सत्ता जाते ही झीरम की याद आई
जगदलपुर। झीरम घाटी मामले को लेकर कांग्रेस द्वारा लगाए जा रहे आरोपों पर महापौर संजय पाण्डेय ने तीखा पलटवार किया है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस झीरम की त्रासदी को न्याय का विषय बनाने के बजाय राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करती रही है। वर्षों तक कांग्रेस के नेता दावा करते रहे कि झीरम कांड से जुड़े सबूत उनकी जेब में हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ में पांच साल सरकार चलाने के बावजूद न तो कथित सबूत जनता के सामने रखे गए और न ही जांच को किसी निर्णायक मुकाम तक पहुंचाया गया।
संजय पाण्डेय ने सवाल उठाते हुए कहा कि यदि कांग्रेस नेताओं के पास वास्तव में ठोस प्रमाण थे, तो सत्ता में रहते उन्हें सामने लाने से किसने रोका? जांच आगे बढ़ाने और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने की जिम्मेदारी तत्कालीन सरकार की थी। उन्होंने कहा कि सत्ता जाने के बाद अचानक झीरम की याद आना और प्रेस कॉन्फ्रेंस की राजनीति शुरू करना कांग्रेस की राजनीतिक हताशा को दर्शाता है।
उन्होंने कहा कि झीरम घाटी की घटना छत्तीसगढ़ के इतिहास की अत्यंत दुखद त्रासदी है। इसमें जान गंवाने वाले नेताओं, कार्यकर्ताओं और सुरक्षाकर्मियों के प्रति पूरे प्रदेश की संवेदनाएं हैं। ऐसे गंभीर मामले में राजनीति के बजाय तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
महापौर ने कहा कि यदि कांग्रेस के पास कोई ठोस प्रमाण हैं तो उन्हें सार्वजनिक बयानबाजी के बजाय जांच एजेंसियों और न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करना चाहिए। उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा, “पांच साल तक सत्ता में रहकर कथित सबूतों पर कुंडली मारकर बैठी कांग्रेस अब प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए अपनी राजनीतिक हताशा जाहिर कर रही है। जेब में सबूत होने का दावा करने वाले पहले यह बताएं कि उनकी सरकार के दौरान वह जेब आखिर सिल किसने दी थी?”
उन्होंने कहा कि केवल आरोपों और बयानबाजी से झीरम जैसी गंभीर घटना की सच्चाई सामने नहीं आ सकती।