
जगदलपुर, 05 सितम्बर. शिक्षक दिवस के पावन अवसर पर लोकभवन के ‘छत्तीसगढ़ मण्डपम्’ में आयोजित भव्य राज्य स्तरीय शिक्षक सम्मान समारोह में प्रदेश के उत्कृष्ट शिक्षकों को सम्मानित किया गया। राज्यपाल श्री रमेन डेका और मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने शिक्षा के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान देने वाले 63 शिक्षकों को वर्ष 2025-26 के ‘राज्यपाल पुरस्कार’ और चार उत्कृष्ट शिक्षकों को ‘राज्य शिक्षक सम्मान स्मृति पुरस्कार’ से नवाजा।
इस सम्मान समारोह के दौरान स्कूल शिक्षा मंत्री श्री गजेन्द्र यादव ने वर्ष 2026-27 के राज्य शिक्षक सम्मान हेतु चयनित 64 शिक्षकों के नामों की घोषणा की। इस सूची में बस्तर जिले के दो कर्मठ शिक्षक श्रीमती कामेश्वरी कश्यप और श्री बुधराम कश्यप का नाम शामिल होना पूरे अंचल के लिए गौरव का क्षण बन गया है। सीमित संसाधनों और दुर्गम परिस्थितियों के बावजूद दोनों शिक्षकों ने अपने सेवाभाव और नवाचार से शिक्षा को एक जन-आंदोलन का स्वरूप दिया है।
कामेश्वरी कश्यप: नवाचार और समर्पण से बदली स्कूल की तस्वीर
बस्तर जिले के विकासखंड बस्तर अंतर्गत पूर्व माध्यमिक शाला मावलीगुड़ा में पदस्थ उच्च श्रेणी शिक्षिका कामेश्वरी कश्यप पिछले 15 वर्षों से ग्रामीण बच्चों के भविष्य को संवारने में जुटी हैं। पदोन्नति के बाद जब उन्होंने मावलीगुड़ा शाला की कमान संभाली, तब वह एकल शिक्षकीय विद्यालय था। उन्होंने बच्चों से आत्मीय रिश्ता कायम कर ‘कबाड़ से जुगाड़’ तकनीक के जरिए पढ़ाई को रोचक बनाया और सहकर्मियों के सहयोग से विद्यालय में आकर्षक ‘मुस्कान पुस्तकालय’ स्थापित किया। उनके मार्गदर्शन में विद्यार्थियों द्वारा बनाए गए विज्ञान मॉडल्स को राज्योत्सव, बस्तर दशहरा और मुख्यमंत्री के कार्यक्रमों में सराहना मिली। कोरोना काल में मोहल्ला क्लास का सफल संचालन करने के लिए उन्हें ‘कोरोना वारियर्स सम्मान’ से भी सम्मानित किया जा चुका है।
बुधराम कश्यप: अभावों से जूझकर बने सैकड़ों बच्चों के मसीहा
जिले के दरभा ब्लॉक के शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय छिन्दबहार में संस्कृत व्याख्याता श्री बुधराम कश्यप का जीवन संघर्ष और परोपकार की अनूठी मिसाल है। बचपन में मीलों पैदल चलकर और मजदूरी कर अपनी शिक्षा पूरी करने वाले श्री कश्यप ने अपने 28 वर्षों के सेवाकाल में 600 से अधिक जरूरतमंद विद्यार्थियों की फीस और शिक्षण सामग्री का खर्च स्वयं उठाया। इसके अतिरिक्त उन्होंने 10 से अधिक निर्धन कन्याओं के विवाह में भी आर्थिक योगदान दिया है। शाला त्यागी बच्चों को स्कूल तक लाने के लिए उन्होंने बाइक रैलियां निकालकर ‘स्कूल चलो अभियान’ को व्यापक रूप दिया। स्थानीय हल्बी व धुरवी बोली के संरक्षण के लिए लेखन, वैश्विक सम्मेलनों में प्रतिनिधित्व और यूट्यूब के माध्यम से सामान्य ज्ञान सिखाने में वे निरंतर सक्रिय हैं।