रिटायरमेंट के बाद बुजुर्ग शिक्षकों को आर्थिक संकट में धकेल रही साय सरकार, कांग्रेस सरकार की तरह पूर्व सेवा अवधि जोड़कर करे पेंशन की बहाली ….
जगदलपुर।
नगर निगम के नेता प्रतिपक्ष राजेश चौधरी ने छत्तीसगढ़ की भारतीय जनता पार्टी सरकार पर कर्मचारियों और शिक्षकों के हितों की अनदेखी करने का आरोप लगाते हुए जारी प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से कहा है कि शिक्षकों को उनकी मूल नियुक्ति तिथि से पेंशन का लाभ नहीं देने का निर्णय पूरी तरह कर्मचारी विरोधी और अन्यायपूर्ण है। उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार के इस निर्णय का सबसे अधिक नुकसान उन शिक्षकों को होगा, जिन्होंने अपने जीवन के महत्वपूर्ण वर्ष प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था और बच्चों के भविष्य को संवारने में लगा दिए हैं।भारतीय जनता पार्टी की सरकार कभी भी कर्मचारियों और श्रमिक वर्ग की हितैषी नहीं रही है भाजपा की नीतियां पूंजीपतियों के हितों को प्राथमिकता देने वाली ही रही हैं, जिसका खामियाजा आम जनता, कर्मचारी, शिक्षक और मध्यम वर्ग भुगत रहे हैं। उन्होंने कहा कि आज देश में बढ़ती महंगाई और आम लोगों पर बढ़ते आर्थिक बोझ के लिए भी केंद्र की भाजपा सरकार की नीतियां जिम्मेदार हैं।छत्तीसगढ़ में लंबे समय तक पंचायत एवं नगरीय निकायों के अधीन सेवाएं देने वाले शिक्षकों के संविलियन का मुद्दा भी भाजपा सरकार के कार्यकाल में लंबित रहा। कांग्रेस सरकार बनने के बाद शिक्षकों के संविलियन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया और 1 जुलाई 2018 से शिक्षकों का संविलियन किया गया। इसके बाद छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार ने कर्मचारियों के हित में निर्णय लेते हुए 1 अप्रैल 2022 से पुरानी पेंशन योजना बहाली की प्रक्रिया पूर्ण की।राजेश चौधरी ने आगे कहा कि कांग्रेस सरकार ने शिक्षकों के हितों को ध्यान में रखते हुए उनकी पूर्व सेवा अवधि को महत्व दिया। पंचायत सेवा काल में कार्यरत रहे शिक्षकों की सेवाओं को ध्यान में रखते हुए उन्हें पेंशन का लाभ देने की दिशा में संवेदनशील निर्णय लिए गए। उन्होंने कहा कि जिन शिक्षकों ने अपनी पहली नियुक्ति से लेकर संविलियन तक वर्षों तक शासकीय स्कूलों में पूरी निष्ठा और जिम्मेदारी के साथ अपनी सेवाएं दी हैं, उनकी सेवा अवधि को पेंशन निर्धारण में शामिल किया जाना पूरी तरह न्यायसंगत है।
नेता प्रतिपक्ष राजेश चौधरी ने कहा कि वर्तमान में यदि शिक्षकों की सेवा की गणना केवल 1 अप्रैल 2018 अथवा 1 जुलाई 2018 से की जाती है और पेंशन के लिए निर्धारित सेवा अवधि की शर्तें लागू की जाती हैं, तो लंबे समय तक सेवा देने वाले अनेक शिक्षकों को उनकी वास्तविक सेवा के अनुरूप पेंशन का लाभ नहीं मिल पाएगा। ऐसी स्थिति में सेवानिवृत्ति के बाद कई बुजुर्ग शिक्षकों को बेहद कम पेंशन पर जीवन गुजारने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। यदि पेंशन की गणना संविलियन की तिथि से ही की जाती है, तो अनेक शिक्षकों को मात्र 2500 से 4000 रुपये या उसके आसपास की पेंशन मिलने की स्थिति बन सकती है, जो आज की महंगाई के दौर में सम्मानजनक जीवन जीने के लिए पर्याप्त नहीं है।जिन शिक्षकों ने अपने जीवन का बहुमूल्य समय बच्चों को शिक्षित करने और समाज के निर्माण में लगाया, उन्हें सेवानिवृत्ति के बाद आर्थिक असुरक्षा में धकेलना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि यह निर्णय बुजुर्ग शिक्षकों को दूसरों पर निर्भर होने और आर्थिक कठिनाइयों का सामना करने के लिए मजबूर कर सकता है। उन्होंने सवाल उठाया कि एक तरफ केंद्र और राज्य की भाजपा सरकारें आत्मनिर्भर भारत और आत्मनिर्भर नागरिक की बात करती हैं, वहीं दूसरी तरफ दशकों तक सरकारी सेवा देने वाले शिक्षकों को सेवानिवृत्ति के बाद आर्थिक रूप से कमजोर करने वाली नीतियां क्यों लागू की जा रही हैं?जब विधायक और सांसद चुनाव जीतने के बाद शपथ ग्रहण की तिथि से वेतन, भत्ते और अन्य सुविधाओं के हकदार होते हैं तथा उनके कार्यकाल के आधार पर पेंशन संबंधी लाभ निर्धारित किए जाते हैं, तो फिर शिक्षकों और कर्मचारियों की मूल नियुक्ति तिथि से उनकी सेवा की गणना कर पेंशन का निर्धारण क्यों नहीं किया जा सकता? उन्होंने कहा कि शिक्षकों ने भी अपनी नियुक्ति की पहली तारीख से ही सरकार और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियां निभाई हैं, इसलिए उनके साथ भी समान और न्यायपूर्ण व्यवहार होना चाहिए।