नारायणपुर। कभी नक्सलियों का गढ़ माने जाने वाले अबूझमाड़ के कुतुल क्षेत्र में अब विकास और विश्वास की नई कहानी लिखी जा रही है। बारिश के मौसम में संपर्क बाधित होने की वर्षों पुरानी समस्या से जूझ रहे ग्रामीणों को अब सुरक्षा बलों के सहयोग से राहत मिलने लगी है।
जिला मुख्यालय से लगभग 50 किलोमीटर दूर स्थित कुतुल से आदिंगपार, मदोड़ा और धोबे तक करीब 30 किलोमीटर का मार्ग आज भी अधिकांशतः कच्चा है। रास्ते में पड़ने वाले कई छोटे-बड़े नदी-नालों के उफान पर आने से हर वर्ष क्षेत्र के 15 से अधिक गांवों और चार सुरक्षा शिविरों का संपर्क मुख्यालय से टूटने का खतरा बना रहता है।
मानसून की इस चुनौती से निपटने के लिए ITBP की 53वीं वाहिनी ने स्थानीय ग्रामीणों के साथ मिलकर अभिनव पहल शुरू की है। जवानों ने ग्रामीणों को प्रशिक्षण देकर जंगल में उपलब्ध लकड़ियों और स्थानीय संसाधनों की सहायता से अस्थायी देसी पुलों का निर्माण कराया है। अब तक इस मार्ग पर सात से अधिक पुल बनाए जा चुके हैं, जबकि अन्य संवेदनशील स्थानों की पहचान कर वहां भी पुल निर्माण की तैयारी की जा रही है।
इन अस्थायी पुलों से बारिश के दौरान ग्रामीणों, सुरक्षा बलों तथा आवश्यक सेवाओं की निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित होने की उम्मीद है। पहले चार महीनों तक क्षेत्र के लगभग 30 गांवों का संपर्क जिला मुख्यालय से कट जाता था, जिससे मरीजों को समय पर उपचार नहीं मिल पाता था और राशन सहित अन्य जरूरी सुविधाओं के लिए ग्रामीणों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता था।
ग्रामीण मंगतू पोटाई बताते हैं कि पहले बारिश के दिनों में हालात बेहद कठिन हो जाते थे, लेकिन अब इन पुलों के कारण लोगों को बड़ी राहत मिली है। उनका कहना है कि यह केवल पुल नहीं, बल्कि जीवन की जंग जीतने जैसा अनुभव है।
इस पहल की सबसे बड़ी उपलब्धि सुरक्षा बलों और ग्रामीणों के बीच बढ़ता विश्वास है। कभी नक्सल प्रभाव के कारण जहां ग्रामीण और सुरक्षा बल आमने-सामने दिखाई देते थे, वहीं आज दोनों मिलकर विकास कार्यों में सहभागी बन रहे हैं। ग्रामीण अब अपने क्षेत्र के भविष्य को बेहतर बनाने में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
लंबे समय तक नक्सल प्रभाव और दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के कारण देश के सबसे कठिन इलाकों में गिने जाने वाले अबूझमाड़ में अब बदलाव स्पष्ट दिखाई दे रहा है। ये अस्थायी पुल केवल लकड़ी से बनी संरचनाएं नहीं, बल्कि विश्वास, सहयोग और विकास की मजबूत नींव के प्रतीक बन गए हैं। जहां कभी बंदूक और बारूद की गूंज सुनाई देती थी, वहीं आज विकास और जनकल्याण की नई इबारत लिखी जा रही है।