आदिवासियों की संस्कृति में बसती है छत्तीसगढ़ की आत्मा – राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू

जगदलपुर, 07 फरवरी देश की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि आदिवासियों की संस्कृति में छत्तीसगढ़ की आत्मा बसती है। उन्होंने बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी के जयघोष के साथ अपने उद्बोधन में कहा कि भारत में छत्तीसगढ़ ऐसा राज्य है, जहां सरकार अपनी संस्कृति, जनजातीय परंपराओं और प्राचीन विरासतों को संरक्षित करने के लिए बस्तर पंडुम जैसे आयोजन कर रही है, इसमें आदिवासियों की गौरवशाली संस्कृति प्रतिबिम्बित होती है। राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू आज जगदलपुर पहुंचीं, जहां पर उन्होंने संभाग स्तरीय बस्तर पंडुम-2026 का शुभारंभ किया।

राष्ट्रपति श्रीमती मुर्मू ने जगदलपुर के ऐतिहासिक लालबाग मैदान में आयोजित समारोह में आदिवासी कलाकारों और विशाल जनसमूह को संबोधित करते हुए कहा कि प्रदेश की विष्णुदेव सरकार छत्तीसगढ़ के आदिवासियों के लिए समर्पित है। विभिन्न योजनाओं के जरिए जनजातीय उत्थान के लिए लगातार बेहतर प्रयास कर रही है। पीएम जनमन, प्रधानमंत्री जनजातीय गौरव उत्कर्ष अभियान तथा नियद नेल्लानार जैसी योजनाओं के माध्यम से लोगों को विकास से जोड़ रही है। उन्होंने बस्तर क्षेत्र में बालिका शिक्षा पर विशेष जोर देते हुए कहा कि आदिवासी बालिकाओं की शिक्षा से जोड़ने के लिए शासन के साथ-साथ समाज और माता-पिता को भी आगे आना चाहिए। राष्ट्रपति ने बस्तर की समृद्ध आदिवासी संस्कृति और गौरवशाली परंपराओं की सराहना करते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ की प्राचीन परंपराओं की जड़ें आज भी मजबूत हैं और बस्तर पण्डुम जनजातीय समुदाय की पहचान, गौरव और उनकी समृद्ध परंपरा को प्रोत्साहित करने वाला एक महत्वपूर्ण मंच है। उन्होंने कहा कि बस्तर पंडुम में 54 हजार से अधिक आदिवासी कलाकारों ने पंजीयन कराया, जो आदिवासी कलाकारों का अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव को प्रदर्शित करता है। राष्ट्रपति ने कहा कि हिंसा का रास्ता छोड़ माओवादी मुख्यधारा में शामिल हो रहे हैं तथा लोकतंत्र के प्रति उनकी आस्था बढ़ी है। वर्षों से बंद विद्यालय खुल रहे हैं, दुर्गम वनांचल में सड़कों, पुल-पुलियों का निर्माण हो रहा है और ग्रामीणजन विकास से जुड़ रहे हैं। बस्तर की सुंदरता और यहां की संस्कृति हमेशा से लोगों के आकर्षण का केंद्र रही है लेकिन दुर्भाग्य से चार दशकों तक यह क्षेत्र माओवाद से ग्रस्त रहा। इस कारण यहाँ के निवासियों ने अनेक कष्ट झेले। भारत सरकार की माओवादी आतंक पर निर्णायक कार्रवाई के परिणामस्वरूप वर्षों से व्याप्त असुरक्षा, भय और अविश्वास का वातावरण अब समाप्त हो रहा है। माओवाद से जुड़े लोग हिंसा का रास्ता छोड़ रहे हैं जिससे नागरिकों के जीवन में शांति लौट रही है। राष्ट्रपति ने आगे कहा कि प्रदेश सरकार के प्रयास और इस क्षेत्र के लोगों के सहयोग के बल पर आज बस्तर में विकास का नया सूर्योदय हो रहा है। गांव-गांव में बिजली, सड़क, पानी की सुविधा उपलब्ध हो रही है। वर्षों से बंद विद्यालय फिर से खुल रहे हैं और बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं। यह बहुत ही सुखद तस्वीर है जो सभी देशवासियों में खुशी का संचार कर रही है। उन्होंने उपस्थित लोगों से अपनी संस्कृति और पारंपरिक विरासतों को संजोने और सहेजने की अपील करते हुए बस्तर की जनजातीय परंपराओं को राष्ट्रीय और वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करने की बात कही।

राज्यपाल श्री रमेन डेका ने कहा कि बस्तर पंडुम कोई साधारण मेला नहीं है, यह हमारी लोक संस्कृति का उत्सव है। यहां के लोकनृत्य, लोकगीत, पारंपरिक पहनावा, आभूषण, ढोल-नगाड़े और हमारे पारंपरिक व्यंजन सब मिलकर बस्तर की सुंदर तस्वीर दुनिया को दिखाती है। गौर नृत्य, परघौनी नृत्य और धुरवा, मुरिया, लेजा जैसे नृत्य, बस्तर की सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक हैं। उन्होंने कहा कि इस तरह का महोत्सव हमारी आदिवासी संस्कृति और परंपराओं को नई पीढ़ी से जोड़ने का सशक्त माध्यम बनता है।

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