नक्सलियों ने घोटुल को कमजोर किया- शिव कुमार पांडेय

नारायणपुर, 19 मार्च । वरिष्ठ साहित्यकार शिव कुमार पांडेय ने आदिवासी संस्कृति, इतिहास और परंपराओं को सहेजते हुए 16 किताबों का एक विशाल संग्रह तैयार किया, जो आज विश्व पटल पर अबूझमाड़ की पहचान को नई दिशा दे रहा है.शिव कुमार पांडेय ने म्ज्ट भारत से बात करते हुए बस्तर की आदिवासी संस्कृति, उनकी भाषा पर पकड़ बनाकर नक्सलवाद के फलने फूलने के बारे में खुलकर बात की. पांडेय कहते हैं कि अबूझमाड़, अपनी प्राकृतिक सुंदरता, सांस्कृतिक समृद्धि और पारंपरिक जीवनशैली के लिए जाना जाता था. लेकिन 1990 के दशक में नक्सलवाद के प्रभाव में आ गया. इस दौर में न केवल विकास कार्य ठप हुए बल्कि आदिवासी समाज की पारंपरिक पहचान भी धीरे धीरे धूमिल होने लगी.
संस्कृति पर प्रभावशिव कुमार पांडेय घोटुल परंपरा के बताते हैं कि बाहरी लेखकों ने घोटुल को गलत तरीके से प्रस्तुत किया. उदाहरण के तौर पर ने इसे ष्नाइट क्लबष् जैसी संज्ञा दी, जबकि घोटुल आदिवासी समाज की सबसे समृद्ध और अनुशासित संस्था है, जहां युवाओं को सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक शिक्षा दी जाती थी
शिव कुमार पांडेय ने बताया कि नक्सलियों ने अपनी विचारधारा थोपते हुए आदिवासी समाज के मूल ढांचे उनकी परंपराओं, रीति-रिवाजों और सामाजिक संस्थाओं पर चोट की. खासकर घोटुल जैसी महत्वपूर्ण सामाजिक संस्था, जो युवाओं के लिए शिक्षा, अनुशासन और सांस्कृतिक प्रशिक्षण का केंद्र थी, उसे निशाना बनाया गया. इस दौरान बाहरी दुनिया से कटे अबूझमाड़ में न तो सही जानकारी पहुंच पाई और न ही यहां की असल संस्कृति का दस्तावेजीकरण हो पाया. जो कुछ लिखा गया, वह अधिकतर बाहरी दृष्टिकोण से था, जैसे कि विद्वानों की व्याख्याएं, जिन्हें स्थानीय लोग कई बार अपूर्ण या गलत मानते हैं.
. यह संस्था समाज के संतुलन, अनुशासन और सांस्कृतिक निरंतरता का आधार रही है. युवाओं को पारंपरिक जीवनशैली से दूर किया. अपनी विचारधारा थोपने के लिए चेतना नाट्य मंडली जैसे माध्यमों का उपयोग किया. वे कहते हैं- नक्सलवाद ने पहले संस्कृति को तोड़ा, फिर समाज से रिश्ता जोड़ा और अंततः उसका शोषण किया.धर्मांतरण पर स्पष्ट दृष्टिकोणशिव कुमार पांडेय ने अबूझमाड़ और बस्तर में बढ़ते धर्मांतरण को एक गंभीर सामाजिक चुनौती बताया है. पांडेय कहते हैं कि धर्मांतरण की प्रमुख वजह प्रलोभन और अशिक्षा है. यह एक धीमी प्रक्रिया (स्लो पॉयजन) की तरह काम करता है. इससे आदिवासी समाज अपनी मूल संस्कृति से दूर होता जा रहा है. उन्होंने उदाहरण के रूप में सरगुजा क्षेत्र का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां धर्मांतरण के बाद कई लोगों ने अपनी पारंपरिक पहचान छोड़ दी है. पांडेय का यह भी मानना है कि नक्सलवाद के दौर में धर्मांतरण को कहीं न कहीं मौन समर्थन मिला, क्योंकि उस समय बाहरी गतिविधियों पर नियंत्रण होने के बावजूद यह प्रक्रिया जारी रही. स्थिति बदल रही है. सुरक्षा बलों की बढ़ती मौजूदगी सड़कों और बुनियादी ढांचे का विकास शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार इन सबके चलते अबूझमाड़ धीरे-धीरे मुख्यधारा से जुड़ रहा है.

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