माओवाद के साये से उभर रहा बस्तर, खंडहरों की जगह ले रहे स्कूल और अस्पताल

सुकमा (बस्तर)।
करीब चार दशकों तक माओवादी हिंसा से प्रभावित रहा बस्तर अब धीरे-धीरे विकास की मुख्यधारा में लौटता नजर आ रहा है। कभी जहां नक्सलियों के भय और हिंसा का माहौल था, वहीं अब शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में बदलाव की तस्वीर उभर रही है।

बीते वर्षों में माओवादियों ने क्षेत्र में विकास कार्यों को बाधित करने के उद्देश्य से कई स्कूल भवन, अस्पताल, सड़कें, पुल और पुलिया को नुकसान पहुंचाया। दूरस्थ आदिवासी इलाकों में सरकारी योजनाओं की पहुंच रोककर स्थानीय लोगों को मुख्यधारा से अलग रखने की कोशिश की गई। इस दौरान आईईडी विस्फोटों और हमलों में सुरक्षाबलों के जवानों सहित कई ग्रामीणों की जान भी गई।

साल 2024 में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा 31 मार्च 2026 तक देश को माओवाद से मुक्त करने का लक्ष्य निर्धारित किए जाने के बाद छत्तीसगढ़ में इस दिशा में प्रयास तेज हुए। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और गृह मंत्री विजय शर्मा के नेतृत्व में सुरक्षा बलों ने रणनीति में बदलाव करते हुए नक्सल प्रभावित इलाकों में अभियान तेज किए हैं। सूचना तंत्र को मजबूत किया गया है और आत्मसमर्पण व पुनर्वास नीति को भी सक्रिय रूप से लागू किया जा रहा है।

इन प्रयासों के चलते बस्तर में माओवाद का प्रभाव लगातार कम होता दिख रहा है।सुकमा जिले सहित कई क्षेत्रों में प्रशासन की पहुंच मजबूत हुई है और विकास कार्यों को गति मिली है।

विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों के अनुसार, जिन स्थानों पर कभी नक्सलियों द्वारा स्कूल और स्वास्थ्य केंद्रों को नुकसान पहुंचाया गया था, वहां अब नए भवन बनाए जा रहे हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार से ग्रामीणों को सीधा लाभ मिल रहा है।

कभी नक्सल प्रभाव वाले गांव अब धीरे-धीरे “नक्सल मुक्त” घोषित किए जा रहे हैं और वहां बुनियादी सुविधाओं का विस्तार हो रहा है। प्रशासनिक गतिविधियों में भी तेजी आई है, जिससे लोगों में विश्वास बढ़ा है।

स्थानीय निवासियों का कहना है कि सुरक्षा बलों की लगातार मौजूदगी और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन से क्षेत्र में सकारात्मक बदलाव महसूस किया जा रहा है।

बस्तर में बदलती यह तस्वीर संकेत दे रही है कि लंबे समय तक हिंसा और भय से जूझने वाला यह क्षेत्र अब विकास और स्थिरता की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

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