साल 2025 का अंत हो चुका है। पूरे वर्ष के दौरान देश में अल्पसंख्यकों, विशेष रूप से मुसलमानों, ईसाइयों, सिखों और अन्य वंचित दलित वर्गों की स्थिति पर नज़र डालें तो तस्वीर बेहद चिंताजनक नज़र आती है। देश के विभिन्न हिस्सों से ऐसी घटनाएं सामने आती रहीं, जिन्होंने अल्पसंख्यकों, दलितों और वंचित वर्गों में भय, असुरक्षा और बेचैनी को और गहरा कर दिया।
एक ऐसा वर्ग सक्रिय दिखाई दिया, जो देश को हिंदू राष्ट्र/ब्राह्मण राज बनाने के नाम पर सभी लोकतांत्रिक और संवैधानिक सीमाओं को पार करता चला गया। कभी तथाकथित हिंदू राष्ट्रवाद का सहारा लिया गया, तो कभी लोकतांत्रिक भारत को सनातन धर्म का देश घोषित कर अन्य धर्मों के मानने वालों की धार्मिक स्वतंत्रता को सीमित करने की कोशिशें की गईं, जबकि भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन करने और उसका प्रचार करने की पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान करता है।
पूरे वर्ष देश के अलग-अलग हिस्सों में भीड़ हिंसा, मॉब लिंचिंग, धर्म के नाम पर हमले, नफरत भरे भाषण और निर्दोष लोगों की गिरफ्तारियां होती रहीं। दुखद तथ्य यह रहा कि अधिकांश मामलों में पीड़ित परिवारों को न्याय नहीं मिल सका, जबकि आरोपियों को खुलेआम संरक्षण प्राप्त रहा। कुछ स्थानों पर तो दोषियों को प्रोत्साहित तक किया गया, जिससे न्याय व्यवस्था पर जनता का भरोसा और कमजोर हुआ।
यह भी सच्चाई है कि एक विशेष विचारधारा से जुड़े लोग खुलेआम संविधान का उल्लंघन करते रहे। उनके लिए अल्पसंख्यकों- चाहे वे मुसलमान हों, ईसाई हों या एससी-एसटी वर्ग-पर होने वाला अत्याचार भी नगण्य प्रतीत होता है। सत्ता की राजनीति के लिए नफरत भरी बयानबाजी, आर्थिक बहिष्कार, धार्मिक स्थलों का अपमान और निराधार कानूनी कार्रवाइयों को सामान्य बना दिया गया। यदि यह रवैया इसी तरह जारी रहा, तो वैश्विक स्तर पर भारत की छवि को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है।
यह भी एक त्रासदी है कि भारत के बाहर, जैसे बांग्लादेश या पाकिस्तान में, यदि अल्पसंख्यकों पर हिंसा होती है, तो उसकी आड़ में भारत के अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जाता है। हाल ही में पश्चिम बंगाल के विपक्षी नेता और भाजपा विधायक सुवेंदु अधिकारी ने बांग्लादेश में हो रही हिंसा के संदर्भ में अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत भरा बयान देते हुए कहा कि भारत सौ करोड़ हिंदुओं का देश है और सरकार हिंदुओं के कल्याण के लिए काम कर रही है। इस बयान से असामाजिक तत्वों को संकेत मिला, जो देश की एकता और अखंडता के लिए गंभीर खतरा है।
इसके अलावा, यति नरसिंहानंद सरस्वती, जो लगातार नफरत भरी बयानबाजी करते रहे हैं, ने एक बार फिर आपत्तिजनक और भड़काऊ टिप्पणी की। उन्होंने हिंदुओं को उकसाते हुए आईएसआईएस जैसी संगठन और आत्मघाती दस्ते बनाने की मांग कर डाली। साथ ही गाजियाबाद में हिंदुओं के बीच तलवारें बांटे जाने का समर्थन करते हुए कहा कि इससे भी अधिक घातक हथियार बांटे जाने चाहिए।
इतना ही नहीं, इस वर्ष असम में होने वाले चुनावों को लेकर वहां के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा का गैर-जिम्मेदाराना बयान भी सामने आया। उन्होंने कहा कि यह चुनाव नहीं बल्कि सभ्यता की लड़ाई (Civilizational Fight) है। यानी अब चुनाव नहीं बल्कि सभ्यताओं की लड़ाई होगी। इस बयान की चारों ओर निंदा की जा रही है।
इसी प्रकार, प्रसिद्ध ‘कथावाचक’ देवकीनंदन ठाकुर ने शुक्रवार को बॉलीवुड अभिनेता शाहरुख खान की आईपीएल फ्रेंचाइज़ी कोलकाता नाइट राइडर्स द्वारा एक बांग्लादेशी क्रिकेटर को खरीदे जाने के बाद आलोचना की। स्पष्ट है कि शाहरुख खान के नाम और पहचान को जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है। यही कारण है कि देवकीनंदन ठाकुर, रामभद्राचार्य और भाजपा के कई नेता इस तरह के बयान दे रहे हैं।
वैसे तो पूरा वर्ष ही, और विशेषकर 2014 के बाद से, देश के अलग-अलग हिस्सों में भीड़ हिंसा की घटनाएं होती रही हैं, लेकिन साल के अंत में बरेली की घटना ने पुलिस और प्रशासन की विफलता को उजागर कर दिया। बरेली में एक हिंदू छात्रा की जन्मदिन पार्टी के दौरान उसके मुस्लिम मित्रों को किस तरह परेशान किया गया, उन पर ‘लव जिहाद’ का झूठा आरोप लगाया गया, जबकि छात्रा ने स्वयं उन्हें आमंत्रित किया था और वे उसके मेहमान थे। लेकिन असामाजिक तत्वों ने केवल धर्म के आधार पर उन्हें हिंसा का शिकार बनाया। इतना ही नहीं, पुलिस ने तत्काल हमलावरों पर कार्रवाई करने के बजाय मुस्लिम युवकों को ही गिरफ्तार कर लिया। यह कोई अकेली घटना नहीं है, बल्कि ऐसे सैकड़ों मामले हो चुके हैं और हो रहे हैं।
पिछले वर्ष और उससे पहले भी जहां-जहां इस तरह की घटनाएं हुईं, वे मीडिया के माध्यम से सामने आई हैं। सभी का उल्लेख संभव नहीं, लेकिन हाल ही में महाराष्ट्र, बिहार और देहरादून में हुई घटनाओं के घाव अभी तक भरे नहीं हैं।
मीडिया की भूमिका भी पूरे वर्ष निराशाजनक ही नहीं बल्कि बेहद निम्न स्तर की रही। पूरी दुनिया में भारतीय ‘गोदी मीडिया’ की आलोचना हो रही है। कई राष्ट्रीय चैनलों ने अल्पसंख्यकों के वास्तविक मुद्दों पर चर्चा करने के बजाय सनसनी और नफरत को प्राथमिकता दी। इसका परिणाम यह हुआ कि देश की गंगा-जमुनी तहज़ीब, आपसी भाईचारे और सामाजिक सौहार्द को भारी नुकसान पहुंचा और समाज में दूरियां और बढ़ती चली गईं।
शिक्षा और रोज़गार के क्षेत्र में भी अल्पसंख्यकों को लगातार नज़रअंदाज़ किया गया। सरकारी छात्रवृत्तियों में कटौती, सरकारी नौकरियों में कम प्रतिनिधित्व और वक्फ संपत्तियों से जुड़े विवादों ने हालात को और जटिल बना दिया। संविधान सभी को समान नागरिक मानता है, लेकिन व्यवहार में अल्पसंख्यकों को द्वितीय और तृतीय श्रेणी का नागरिक बनाने की कोशिशें साफ दिखाई देती हैं।
धार्मिक त्योहारों तक को नफरत का निशाना बनाया गया। क्रिसमस जैसे पर्व पर वाराणसी में जापानी पर्यटकों को केवल सांता क्लॉज़ की टोपी पहनने पर परेशान किया गया, और इसके बाद ईसाइयों के खिलाफ देशव्यापी हंगामे एक खतरनाक प्रवृत्ति की ओर इशारा करते हैं। कई अन्य शहरों और कस्बों में भी जहां ईसाई समुदाय क्रिसमस मना रहा था, वहां खुलेआम गुंडागर्दी और तोड़फोड़ की गई, जिसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निंदा हुई और देश की छवि को नुकसान पहुंचा।
कानून निर्माण के ज़रिये भी अल्पसंख्यकों पर दबाव बनाने की कोशिशें जारी रहीं। सीएए, एनआरसी, वक्फ एक्ट, गौ-रक्षा कानून, धर्मांतरण कानून और यूएपीए जैसे कानूनों का प्रयोग अक्सर भेदभावपूर्ण रवैये के रूप में सामने आया। साथ ही “घुसपैठिये”, “लव जिहाद”, “कटुए” और “जिहादी” जैसे नारे समाज को और अधिक बांटने का माध्यम बने। यदि इस नफरत को समय रहते नहीं रोका गया, तो यह देश के लिए बेहद घातक सिद्ध होगा।
अदालतों से न्याय की उम्मीद के बावजूद, न्याय में देरी और कई संवेदनशील मामलों में चुप्पी ने आम नागरिकों को बेचैन किया। जब कानून सबके लिए समान नहीं दिखता, तो लोकतंत्र की नींव कमजोर पड़ने लगती है। अब न्यायपालिका पर भी सवाल उठने लगे हैं।
साल 2025 कई सवाल छोड़कर गया है। अब समय आ गया है कि केवल शिकायतों तक सीमित न रहा जाए, बल्कि भविष्य के लिए ठोस रणनीति तैयार की जाए। सबसे पहले अल्पसंख्यकों को अपने संवैधानिक अधिकारों से अवगत होना होगा और शांतिपूर्ण, लोकतांत्रिक तरीकों से अपनी आवाज़ बुलंद करनी होगी। शिक्षा, रोज़गार और सुरक्षा की गारंटी सबसे बड़ा हथियार है; बच्चों की शिक्षा और युवाओं के मार्गदर्शन को प्राथमिकता देना अनिवार्य है।
राजनीतिक भागीदारी बढ़ाना भी समय की आवश्यकता है। केवल मतदान ही नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व की मांग और जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी। सोशल मीडिया, समाचार पत्रों और स्थानीय मंचों के माध्यम से सच्चाई के साथ अपनी बात रखने के लिए मजबूत मीडिया प्लेटफॉर्म तैयार करने होंगे।
न्याय किसी एक धर्म का मुद्दा नहीं, बल्कि सभी न्यायप्रिय नागरिकों का साझा प्रश्न है। नए वर्ष में समझदारी, एकता और निरंतर संघर्ष ही वह रास्ता है, जिससे भारत का हर नागरिक स्वयं को सुरक्षित, सम्मानित और समान महसूस कर सके।
संक्षेप में, वर्ष 2025 ने एक बार फिर साबित कर दिया कि यदि अल्पसंख्यकों की असुरक्षा को इसी तरह नज़रअंदाज़ किया गया, तो इसका नुकसान केवल एक वर्ग तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपनी चपेट में ले लेगा। नफरत, भेदभाव और एकतरफा कानून के सहारे न तो देश की एकता बचाई जा सकती है और न ही संविधान की आत्मा सुरक्षित रह सकती है। लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति इसी में है कि बहुसंख्यक अपनी ताकत का उपयोग कमजोरों की रक्षा के लिए करे, न कि उन्हें भयभीत कर हाशिए पर धकेलने के लिए।
अब भी समय है कि देश के सभी न्यायप्रिय नागरिक – चाहे वे किसी भी धर्म या वर्ग से हों-संविधान, कानून और मानवीय मूल्यों की रक्षा के लिए एकजुट हों। अल्पसंख्यकों का संरक्षण वास्तव में भारत के भविष्य, उसकी लोकतांत्रिक परंपरा और गंगा-जमुनी तहज़ीब का संरक्षण है। यदि नफरत की राजनीति पर समय रहते रोक नहीं लगी, तो इतिहास हमें कभी माफ़ नहीं करेगा। नए वर्ष में यही संकल्प होना चाहिए कि भारत केवल बहुसंख्यकों का नहीं, बल्कि हर नागरिक का सुरक्षित, सम्मानजनक और समान देश बने।