जगदलपुर, 01 अप्रैल। पूर्व केंद्रीय मंत्री और आदिवासी नेता अरविन्द नेताम का कहना है कि नक्सलवाद के समाधान में भारत सरकार की बड़ी भूमिका रही है और इसका श्रेय सरकार को जाता है। उन्होंने कहा कि जिन इलाकों में नक्सलियों का दबदबा था, उन क्षेत्रों को बेहतर तरीके से संभालना और वहां रहने वाले ग्रामीणों की सोच में बदलाव लाना जरूरी है। उनके अनुसार जल, जंगल, जमीन के लिए संघर्ष करने वाले आदिवासियों का बस्तर अब एक नए दौर में प्रवेश कर रहा है और नक्सलवाद का खात्मा उनके विकास के लिए नई उम्मीद और नया सवेरा लेकर आया है।
वहीं पूर्व आईपीएस अधिकारी पन्ना लाल का मानना है कि नक्सलवाद केवल एक सुरक्षा समस्या नहीं बल्कि एक विचारधारा है। उन्होंने कहा कि इस विचारधारा को खत्म करना संभव है, लेकिन इसमें समय लगेगा। समाज स्तर पर लगातार काम करना होगा, लोगों की सोच बदलनी होगी और उन्हें मुख्यधारा से जोड़ना होगा, तभी स्थायी समाधान मिल सकेगा।
छत्तीसगढ़ के पूर्व डीजीपी डब्लू एस अंसारी का कहना है कि नक्सलवाद का अंत जागरूकता से होगा। उनके मुताबिक आज की स्थिति में कोई भी हिंसा नहीं चाहता। बस्तर के ग्रामीण दो-तीन पीढ़ियों से इस संघर्ष को झेल चुके हैं सैकड़ों गांव तबाह हुए, लोग बेघर और अनाथ हुए। यही वजह थी कि नक्सलवाद के खिलाफ लोगों में भारी आक्रोश पैदा हुआ और उन्होंने सरकार का साथ देना शुरू किया। आदिवासी नेता महेंद्र कर्मा के पहल से सलवा जुडूम की शुरू हुआ उससे काफी फर्क पड़ा था यहीं से नक्सलवाद की उलटी गिनती शुरू हुई।
विशेषज्ञ मानते हैं कि सरकार की रणनीति, सुरक्षा अभियानों और ग्रीन कॉरिडोर जैसे प्रयासों से नक्सलवाद को जमीन पर काफी हद तक खत्म किया गया है, लेकिन इसकी विचारधारा को पूरी तरह समाप्त करना अभी भी चुनौती बना हुआ है। इसके लिए सबसे जरूरी है विकास, शिक्षा, रोजगार और विश्वास का माहौल।
बस्तर में आज बंदूकें खामोश हो रही हैं, सरेंडर बढ़ रहे हैं, सड़कें बन रही हैं और विकास की रफ्तार तेज हो रही है। लेकिन असली जीत तब होगी जब नक्सलवाद की सोच पूरी तरह खत्म होगी और आदिवासी समाज खुद को सुरक्षित, सम्मानित और विकसित महसूस करेगा। फिलहाल बस्तर एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है। 4 दशकों से ज्यादा लंबे संघर्ष के बाद अब यहां बंदूक की जगह विकास, डर की जगह भरोसा और हिंसा की जगह मुख्यधारा की तस्वीर उभर रही है।
इस पूरी कहानी का एक कड़वा सच आज भी जमीन के नीचे छुपा है आईईडी यानी बारूदी सुरंगें। नक्सलवाद के खात्मे के दावों के बीच बस्तर आज भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। हर पगडंडी, हर जंगल का रास्ता और हर निर्माण स्थल एक संभावित खतरा बना हुआ है। आईईडी एक ऐसा खामोश दुश्मन है, जो कभी भी विकास के दावों को झकझोर सकता है। आईईडी सिर्फ सुरक्षाबलों के लिए ही नहीं, बल्कि आम ग्रामीणों के लिए भी बड़ा खतरा है। जब ग्रामीण जंगल जाते हैं, बच्चे स्कूल जाते हैं या किसान खेतों में उतरते हैं, तो हर कदम पर अनजाना डर साथ चलता है। एक छोटी सी चूक और एक विस्फोट और जिंदगी पल भर में खत्म। इन धमाकों में अक्सर निर्दोष ग्रामीण, बच्चे और कभी-कभी खुद सुरक्षाबल भी शिकार बन जाते हैं।
नक्सलियों की रणनीति रही है विकास कार्यों को रोकना, इसलिए सड़कों, पुलों और निर्माण स्थलों को बारूदी सुरंगों से पाट दिया गया। नतीजा यह है कि विकास की रफ्तार भले तेज हुई है, लेकिन खतरा अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। सीमित संसाधनों और घने जंगलों के बीच सुरक्षा बलों की बीडीएस टीमें लगातार इन बारूदी सुरंगों को खोजने और निष्क्रिय करने में जुटी हैं, लेकिन चुनौती अभी भी बड़ी है।