बिलासपुर/ बिहार, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और झारखंड के बाद अब छत्तीसगढ़ में भी सर्राफा दुकानों में बुर्का, नकाब और हेलमेट पहनकर प्रवेश पर रोक लगाने का फैसला लिया गया है। यह निर्णय छत्तीसगढ़ प्रदेश सर्राफा एसोसिएशन की आपातकालीन बैठक में लिया गया, जिसकी अध्यक्षता प्रदेश अध्यक्ष कमल सोनी ने की।
इसके अलावा अंबिकापुर में स्थित जगदंबा आभूषण भंडार में चोरी की कोशिश और सुकमा में हुई 13 लाख की लूट जैसी घटनाओं के बाद सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता सामने आई है। इन्हीं बढ़ती आपराधिक घटनाओं को देखते हुए यह कठोर फैसला लिया गया है।
आपात बैठक में लिया गया निर्णय
बिलासपुर में हुई इस इमरजेंसी बैठक में प्रदेशभर के सर्राफा व्यापारियों ने हिस्सा लिया। बैठक में बिलासपुर से प्रकाश गोलचा और पवन अग्रवाल, रायपुर से हर्षवर्धन जैन, प्रदीप घेरपोड़े और संजय कुमार कनुगा, दुर्ग से उत्तमचंद भंडारी, बस्तर से राजू दुग्गड़ तथा सरगुजा से राजेश सोनी मौजूद रहे। सभी ने एकमत से यह निर्णय लिया कि अब सर्राफा दुकानों में नकाब, बुर्का या हेलमेट पहनकर प्रवेश की अनुमति नहीं दी जाएगी।
क्यों लेना पड़ा यह फैसला?
सर्राफा संघ का कहना है कि हाल के वर्षों में ज्वेलरी शॉप्स में लूटपाट और चोरी की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। अपराधी अक्सर पहचान छुपाने के लिए चेहरा ढककर वारदात को अंजाम देते हैं। ऐसे में दुकानदारों और ग्राहकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए यह कदम जरूरी हो गया था।

क्या यह फैसला धर्म के आड़े आएगा?
इस फैसले को लेकर यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या यह किसी धर्म विशेष के अधिकारों से टकराएगा। संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत सभी नागरिकों को अपने धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता है। हिजाब को लेकर यह भी माना जाता है कि यह एक मजहबी परंपरा है, लेकिन यदि कोई मुस्लिम महिला हिजाब न पहने तो उसे गैरकानूनी या हराम नहीं माना जाता। साथ ही, यदि कोई महिला इस्लामिक परंपराओं के अनुसार जीवन जीना चाहती है तो वह उसका पालन कर सकती है।
हालांकि, सर्राफा संघ का तर्क है कि यह फैसला धार्मिक आस्था के खिलाफ नहीं, बल्कि सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए लिया गया है। संघ का कहना है कि दुकानों में सुरक्षा मानकों के तहत चेहरे को ढका रखने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
गौरतलब है कि वर्ष 2024 में मुंबई के एक निजी कॉलेज के उस नियम पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी थी, जिसमें कहा गया था कि परिसर में छात्र-छात्राएं हिजाब, टोपी या बैज पहनकर नहीं आ सकते। ऐसे में छत्तीसगढ़ सर्राफा संघ का यह निर्णय अब सुरक्षा बनाम धार्मिक स्वतंत्रता की बहस के केंद्र में आ गया है।
आगे की राहप्रदेश सर्राफा संघ का कहना है कि वह इस फैसले को लागू करते समय संवेदनशीलता बरतेगा और किसी भी वर्ग की भावनाओं को आहत करने का उद्देश्य नहीं है। संघ का मुख्य मकसद दुकानों में हो रही लूट और चोरी की घटनाओं पर रोक लगाना और ग्राहकों व व्यापारियों दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
अब देखना यह होगा कि यह फैसला कानूनी कसौटी पर कितना टिकता है और क्या राज्य में इसे लेकर कोई व्यापक सामाजिक या राजनीतिक प्रतिक्रिया सामने आती है।