बारसूर की ऐतिहासिक धरोहर और माता दंतेश्वरी के महत्व को जाना
जगदलपुर, 17 मार्च. राष्ट्रीय आविष्कार अभियान के अंतर्गत बस्तर जिले के विद्यार्थियों के लिए एक प्रेरणादायक शैक्षणिक भ्रमण का आयोजन किया गया। इस भ्रमण के माध्यम से विद्यार्थियों को इतिहास, संस्कृति, पर्यावरण और विज्ञान को प्रत्यक्ष रूप से समझने का अवसर मिला। यह कार्यक्रम जिला कलेक्टर श्री आकाश छिकारा के निर्देशन तथा जिला पंचायत सीईओ श्री प्रतीक जैन के मार्गदर्शन में आयोजित किया गया। कार्यक्रम को सफल बनाने में जिला शिक्षा अधिकारी श्री बलिराम बघेल एवं जिला मिशन समन्वयक श्री अशोक पांडे का विशेष मार्गदर्शन प्राप्त हुआ।
समग्र शिक्षा की ओर से एपीसी श्री जय नारायण पाणिग्रही एवं श्री सूरज निर्मलकर का भी महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्राप्त हुआ, जिनके सहयोग से इस शैक्षणिक भ्रमण का सफल आयोजन किया गया।
इस शैक्षणिक भ्रमण के दौरान विद्यार्थियों ने बस्तर क्षेत्र के ऐतिहासिक नगर बारसूर (जिला दंतेवाड़ा) का भ्रमण किया। बारसूर को “मंदिरों का शहर” कहा जाता है, जहाँ 10वीं–11वीं शताब्दी में छिंदक नागवंशी शासकों की राजधानी हुआ करती थी। उस समय इसे चक्रकोट या भ्रमरकोट के नाम से जाना जाता था। यहाँ कभी लगभग 147 मंदिरों और तालाबों का समूह था, जो उस समय की समृद्ध संस्कृति और स्थापत्य कला का प्रमाण है।
विद्यार्थियों ने बारसूर की प्रसिद्ध जुड़वा गणेश प्रतिमाओं को देखा, जो एक ही ग्रेनाइट पत्थर से निर्मित विशाल और अनूठी मूर्तियाँ हैं। इसके साथ ही उन्होंने ऐतिहासिक बत्तीसा मंदिर का अवलोकन किया, जिसमें 32 सुंदर पत्थर के खंभे हैं और जिन पर अद्भुत नक्काशी की गई है। बच्चों ने मामा-भांजा मंदिर की अनोखी वास्तुकला और उससे जुड़ी लोककथा के बारे में भी जानकारी प्राप्त की। इसके अतिरिक्त 11वीं शताब्दी के चंद्रादित्य मंदिर की प्राचीन संरचना और शिल्पकला को देखकर विद्यार्थियों ने उस समय की उन्नत कला और स्थापत्य परंपरा को समझा।
भ्रमण के दौरान विद्यार्थियों को यह भी बताया गया कि बारसूर की मंदिर वास्तुकला और मूर्तिकला इतनी उत्कृष्ट है कि इसे दंतेवाड़ा का “खजुराहो” भी कहा जाता है। यहाँ की पत्थर की नक्काशी और मंदिरों की संरचना प्राचीन भारतीय कला की श्रेष्ठ परंपरा को दर्शाती है।
इसके साथ ही विद्यार्थियों ने माता दंतेश्वरी के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व के बारे में भी जाना। माता दंतेश्वरी को बस्तर की आराध्य देवी माना जाता है और बस्तर की सांस्कृतिक पहचान में उनका विशेष स्थान है। बस्तर की लोकपरंपराओं, विशेषकर बस्तर दशहरा और स्थानीय आस्थाओं में माता दंतेश्वरी की महत्वपूर्ण भूमिका है, जो क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए रखती है।
इस शैक्षणिक भ्रमण के दौरान विद्यार्थियों को पर्यावरण और विज्ञान के दृष्टिकोण से भी जानकारी दी गई। बारसूर के आसपास की हरियाली, प्राचीन तालाबों की संरचना और जल प्रबंधन प्रणाली को देखकर बच्चों ने यह समझा कि प्राचीन काल में भी लोग प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन जीते थे। इससे विद्यार्थियों में पर्यावरण संरक्षण और जैव विविधता के प्रति जागरूकता बढ़ी।
इस अवसर पर शिक्षक मनीष कुमार अहीर द्वारा विद्यार्थियों को स्थल पर जानकारी देकर मार्गदर्शन प्रदान किया गया। विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लेते हुए इतिहास, संस्कृति, विज्ञान और पर्यावरण से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण तथ्यों को जाना और अपनी जिज्ञासा तथा समझ को और अधिक विकसित किया।
यह शैक्षणिक भ्रमण विद्यार्थियों के लिए एक ज्ञानवर्धक और प्रेरणादायक अनुभव साबित हुआ, जिसने उन्हें अपनी ऐतिहासिक धरोहर, संस्कृति और पर्यावरण के महत्व को समझने का अवसर प्रदान किया।