कांकेर। रियासत काल से चली आ रही परंपराओं का जीवंत प्रतीक कांकेर का ऐतिहासिक मेला एक बार फिर श्रद्धा, आस्था और संस्कृति के रंग में रंगा नजर आया। चार दिवसीय इस मेले की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ स्थित माँ दंतेश्वरी का मंदिर साल में केवल एक दिन श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खोला जाता है।
नए साल की शुरुआत में पड़ने वाले पहले रविवार को आरंभ होने वाले इस मेले की परंपरा सदियों पुरानी है। मेले के पहले दिन आसपास के देवी-देवताओं की टोली बाजे-गाजे के साथ राजमहल पहुँचती है, जहाँ राजपरिवार के सदस्यों की उपस्थिति में विधिवत पूजा-अर्चना के बाद देवी-देवताओं की शोभायात्रा मुख्य मार्ग से होते हुए मेलाभाटा स्थल तक पहुँचती है।
मेलाभाटा पहुँचने से पूर्व माँ दंतेश्वरी मंदिर के द्वार खोले जाते हैं। यह मंदिर पूरे वर्ष बंद रहता है और केवल इसी अवसर पर खुलता है। राजपरिवार के सदस्य, मंदिर के पुजारी एवं देवी-देवताओं की मौजूदगी में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। इसके पश्चात आम श्रद्धालुओं को माँ दंतेश्वरी के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त होता है। पुजारियों के अनुसार यह परंपरा रियासत काल से चली आ रही है, जिसे आज भी पूरी आस्था के साथ निभाया जा रहा है। पूजा के दौरान क्षेत्र की खुशहाली और समृद्धि की कामना की जाती है।
मंदिर में पूजा के पश्चात मेलाभाटा स्थल पर मेला खंभे की पूजा राजपरिवार द्वारा की जाती है। इसके बाद देवी-देवताओं की टोली राजपरिवार के सदस्यों के साथ पूरे मेला परिसर की ढाई परिक्रमा करती है। यह रस्म आस्था, परंपरा और संस्कृति से जुड़ी हुई है, जो आज भी पूरी जीवंतता के साथ निभाई जा रही है। इसके साथ ही औपचारिक रूप से मेले की शुरुआत होती है और लोग एक-दूसरे को बधाई देते हैं।
इस वर्ष मेले की रौनक उस समय और बढ़ गई जब कांकेर लोकसभा सांसद भोजराज नाग भी देवी-देवताओं की टोली के साथ शामिल हुए। बाजे-गाजे की धुन पर सांसद भोजराज नाग को थिरकते हुए देखा गया, जिससे श्रद्धालुओं और दर्शकों में उत्साह और अधिक बढ़ गया।
उत्तर बस्तर कांकेर का यह ऐतिहासिक मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि क्षेत्र की संस्कृति, सभ्यता और अनोखी परंपराओं का प्रतीक है। यही कारण है कि इसे देखने देश ही नहीं, बल्कि विदेशों से भी लोग यहाँ पहुँचते हैं।