कुम्हड़ाकोट में प्रकृति और संस्कृति का भव्य संगम
डम्पिंग ग्राउण्ड से पर्यटन और स्वरोजगार का केंद्र बनी जनजातीय गौरव वाटिका

जगदलपुर, 24 फरवरी जगदलपुर शहर के कुम्हड़ाकोट क्षेत्र में स्थित जनजातीय गौरव वाटिका की विकास यात्रा “गार्बेज से गौरव तक के सफर” की एक अनुपम मिसाल बन गई है। कभी यह स्थान आरक्षित वनखण्ड कक्ष क्रमांक 1021 का वह हिस्सा था जो उपेक्षा के कारण धीरे-धीरे अतिक्रमण और गंदगी की चपेट में आकर एक डम्पिंग ग्राउण्ड में तब्दील होता जा रहा था। इस ‘शून्य’ हो चुकी वन भूमि का कायाकल्प करने के लिए बस्तर वनमण्डल ने समाज के हर वर्ग और विशेषकर नारी शक्ति को साथ लेकर इसके पुनरुद्धार का बीड़ा उठाया। आज वर्षों से जमा कचरे को साफ कर इस क्षेत्र को सुरक्षा दीवार से सुरक्षित कर दिया गया है, जहाँ 1700 मीटर लंबे “नेचर ट्रेल” और सुंदर तालाब के निर्माण ने इस बंजर भूमि में नई जान फूंक दी है।वाटिका के बीचों-बीच निर्मित तालाब और आईलैण्ड पर्यटकों के लिए एक प्रमुख आकर्षण केंद्र हैं, जहाँ लोग सुकून के पल बिता सकते हैं।
आगंतुकों के स्वास्थ्य और मनोरंजन को ध्यान में रखते हुए यहाँ योग चबूतरा, योग शेड और ओपन जिम ट्रेल जैसी सुविधाएँ उपलब्ध कराई गई हैं। बैठने और विश्राम करने के लिए यहाँ 5 भव्य पैगोडा और आकर्षक ब्रिज का निर्माण किया गया है। वनस्पति विविधता की बात करें तो यहाँ औषधीय पौधों, फलदार वृक्षों, फूलों की क्यारियों और बाँस की विभिन्न प्रजातियों का रोपण किया गया है, जो पूरे क्षेत्र को सुगंधित और हरा-भरा बनाए रखते हैं।
खान-पान के शौकीनों के लिए यहाँ ‘जंगल कैन्टीन’ संचालित है, जहाँ महिला स्व-सहायता समूहों द्वारा पारंपरिक और स्थानीय व्यंजन परोसे जाते हैं। इसके अलावा, पूरी वाटिका को ‘इको-फ्रेंडली’ और ‘प्लास्टिक फ्री ज़ोन’ के रूप में विकसित किया गया है, जो पर्यावरण संरक्षण के प्रति एक बड़ी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। प्रवेश द्वार पर पर्यटकों की सुविधा के लिए भव्य पार्किंग और प्रसाधन की भी सुचारू व्यवस्था की गई है।
जहाँ कभी कचरे की बदबू हवा में घुली रहती थी, वहाँ अब औषधीय, फलदार और फूलदार पौधों की क्यारियाँ महक रही हैं, जो शहर के लिए ‘फेफड़े’ की तरह काम कर रही हैं। वर्तमान में वाटिका का समस्त प्रबंधन और देख-रेख 20 महिलाओं के समूह द्वारा किया जा रहा है, जिससे न केवल उन्हें आत्मनिर्भरता मिली है बल्कि उनके परिवारों के लिए नियमित आय का मार्ग भी प्रशस्त हुआ है। स्थल के प्रारंभ से अब तक दस हजार से अधिक लोगों वाटिका का भ्रमण किया है, महिला समूह ने लगभग दो लाख की आमदनी अर्जित की है। पर्यटक यहाँ ‘जंगल केंटिन’ में स्थानीय व्यंजनों का आनंद ले सकते हैं और इको-फ्रेंडली नीति के तहत इसे पूरी तरह से ‘प्लास्टिक फ्री ज़ोन’ बनाया गया है। आर्थिक रूप से भी यह परियोजना अत्यंत सफल सिद्ध हो रही है। शहरवासियों के लिए यह स्थान अब सुबह योग चबूतरे पर अभ्यास करने और शाम को पैगोडा में विश्राम करने के लिए एक भव्य और अनमोल ठिकाना बन गया है। भव्य पार्किंग, प्रसाधन और ओपन जिम जैसी सुविधाओं से लैस यह वाटिका बस्तर की समृद्ध जनजातीय विरासत और प्रकृति के प्रति उनके सम्मान का प्रतीक बनकर उभरी है।