जिला प्रशासन ने ‘मनो बस्तर’ की प्रथम वर्ष की लर्निंग रिपोर्ट की जारी की, पहल ने दूसरे वर्ष में किया प्रवेश

जगदलपुर 28 जनवरी. जिला प्रशासन द्वारा वर्ष 2024 में प्रारंभ की गई जिला-स्तरीय पहल ‘मनो बस्तर’ अपने कार्यान्वयन के दूसरे वर्ष में प्रवेश कर रही है। यह पहल बस्तर जिले के सभी सात विकासखंडों में स्थित आदिवासी आवासीय संस्थानों में रहने वाले बच्चों के मानसिक एवं मनोसामाजिक कल्याण को सुदृढ़ करने तथा आत्महत्या की रोकथाम एवं उसके बाद की देखभाल (पोस्टवेंशन) हेतु संस्थागत तैयारियों को मजबूत करने के उद्देश्य से संचालित की जा रही है।

प्रथम वर्ष की लर्निंग रिपोर्ट का विमोचन बस्तर पंडुम के अवसर मुख्य अतिथि विधायक जगदलपुर श्री किरण सिंह देव, विधायक चित्रकोट श्री विनायक गोयल, महापौर श्री संजय पांडेय एवं जिला पंचायत सी ई ओ श्री प्रतीक जैन द्वारा किया गया।
बस्तर के आवासीय शैक्षणिक संस्थान आदिवासी बच्चों के जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये संस्थान केवल शिक्षा के केंद्र नहीं हैं, बल्कि बच्चों के लिए देखभाल, संबंधों और दैनिक जीवन का मुख्य वातावरण भी हैं। इस संदर्भ में बच्चों का मनोसामाजिक कल्याण उनकी सुरक्षा, अपनत्व की भावना, सहभागिता और स्वस्थ विकास से गहराई से जुड़ा हुआ है।
मनो बस्तर मौजूदा आवासीय शिक्षा व्यवस्था के भीतर रहकर, ऐसे दैनिक व्यवहारों और प्रक्रियाओं को सशक्त बनाता है जो भावनात्मक कल्याण, सकारात्मक सहपाठी संबंधों तथा प्रारंभिक पहचान एवं सहायक प्रतिक्रिया हेतु संस्थागत तैयारियों को मजबूत करते हैं — जिनमें आत्महत्या की रोकथाम और पोस्टवेंशन के समन्वित प्रयास भी शामिल हैं।
अपने पहले वर्ष में, मनो बस्तर ने जिले के 70 आवासीय संस्थानों में अध्ययनरत 6500 से अधिक बच्चों के साथ प्रत्यक्ष रूप से कार्य किया। इस दौरान अधीक्षक, देखभालकर्ता एवं सहायक स्टाफ, प्राचार्य तथा पंचायत राज संस्थाओं के प्रतिनिधियों के साथ घनिष्ठ समन्वय में कार्य किया गया।
इसके अतिरिक्त, बस्तर जिले के 246 आदिवासी आवासीय संस्थानों के सभी अधीक्षकों ने आत्महत्या की रोकथाम एवं पोस्टवेंशन पर संरचित क्षमता-वर्धन प्रशिक्षण में भाग लिया, जिससे बड़े पैमाने पर संस्थागत तैयारियों और प्रतिक्रिया तंत्र को सुदृढ़ किया गया।
प्रथम वर्ष की लर्निंग रिपोर्ट में कार्यान्वयन की प्रमुख प्रक्रियाओं और प्रशासनिक सीखों का दस्तावेजीकरण किया गया है। रिपोर्ट में यह रेखांकित किया गया है कि निरंतर संवाद, परिचित संबंध और सुरक्षित दैनिक वातावरण बच्चों को स्वयं को व्यक्त करने, सक्रिय रूप से भाग लेने तथा अपने अनुभव और चिंताएँ साझा करने में सक्षम बनाते हैं, जिससे अधिक संवेदनशील और सहायक संस्थागत प्रक्रियाएँ विकसित हो पाती हैं।

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