दंतेवाड़ा / एक तरफ सुशासन में सरकार नक्सली हिंसा से पीड़ित परिवारों को राहत देने की बात कहती है मगर दंतेवाड़ा में तोमर का परिवार अलग कहानी कहता है । 2013 में नक्सली हिंसा में जान गंवा चुके स्व शिवदयाल सिहं तोमर का परिवार आज मुश्किलों के दौर में है। 29 अप्रेल 2013 में दंतेवाड़ा से 30 किमी दूर कावड़गाँव में ब्रिज निर्माण कार्य करवाने के दौरान नक्सलियों ने उनकी हत्या कर दी थी। इसके अलवा वे बीजेपी की विकास यात्रा में प्रभारी भी थे
उनकी पत्नि 50 वर्षीय सुनीता तोमर ने जिला कलेक्टर को पत्र लिखकर लगतार उनके परिवार पर प्रशासनिक मुसीबतों की बात जाहिर की है। जिले की कैलाश नगर की निवासी सुनीता तोमर दंतेवाड़ा कलेक्टर को लिखे पत्र में लिखती हैं उनके पति शिवदयाल सिंह की जमीन पर दो लोगों ने अवैध कब्जा कर रखा है और न्यायालय के आदेश के बावजूद तहसील कार्यालय कब्जाधारियों को नही हटा रहा है।
कलेक्टर को लिखे पत्र में कहा गया है कि तहसील कार्यालय ने माना है कि उस जमीन पर अवैध कब्जा हुआ है जिस का मालिकाना हक स्व शिवदयाल सिंह की विधवा सुनीता तोमार का है।
सुनीता तोमर के मुताबिक हमारी जमीन खसरा नंबर 312/14 रकबा में 0.1410 हैक्टयर की है जिसमें गणेश सिंह और सुधीर कुमार साहू ने अवैध निर्माण कर रखा है। जिसकी शिकायत पर तहसील कार्यालय केवल सरकारी खाना-पूर्ति में लगा है मगर अवैध निर्माणकारियों को हटाने में कामयाब नहीं हो सका है।
क्या इन्हें स्थानीय प्रशासन का शह मिल रही है? स्व शिव दयाल सिंह तोमर की पत्नि कलेक्टर को लिखे पत्र में कहती हैं कि जमीन पर मालिकाना हक मेरा है इसके पूरे कागजात मेरे पास हैं फिर क्यों प्रशासन इन्हें शह दे रहा है ? आखिर क्यों ये बेधड़क निर्माण कर रहें हैं? तहसील कार्यालय के पत्र क्रमांक 99. अ में सुधीर कुमार को साफ तौर पर तहसील कार्यालय ने कहा है कि निर्माण कार्य बंद करे।
पूरे मामले में सरकार उदासीनता और नक्सली हिंसा में पीड़ित परिवार की बेबसी दिखाई दे रही है। संवैधानिक प्रकिया से गुजरकर परिवार ने साबित कर दिया है उक्त जमीन का हिस्से की वे स्वामी है । दोनों ही पक्ष विधवा की जमीन पर अवैध निर्माण कर चुके हैं जिस पर तहसील कार्यालय का मौन रहना कई सवालों को जन्म देता है।
यह मामला एक ऐसे परिवार की स्थिति को बताता है जो पहले ही नक्सली हिंसा से तबाह हो चुका है, और अब उसे अपनी जायदाद के लिए एक और लड़ाई लड़नी पड़ रही है। मालिकाना हक साबित करने के लिए सभी संवैधानिक और कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करने के बाद, सुनीता तोमर कहती हैं कि प्रशासनिक निष्क्रियता के कारण वह लाचार महसूस कर रही हैं।
चूंकि दोनों आरोपी पक्ष उसकी ज़मीन पर अवैध निर्माण जारी रखे हुए हैं, इसलिए तहसीलदार के ऑफिस की चुप्पी और निष्क्रियता ने इस क्षेत्र में नक्सली हिंसा के पीड़ितों के लिए शासन, जवाबदेही और न्याय को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा कर दी हैं।
अब सुनीता तोमर को उम्मीद है कि ज़िला कलेक्टर दखल देंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि अतिक्रमण करने वालों को हटाया जाए और उसके कानूनी अधिकार आखिरकार बहाल हों।
नक्सली हिंसा में अपने पति को खोने के एक दशक से ज़्यादा समय बाद, सुनीता तोमर आज भी लड़ रही हैं-इस बार बंदूकों के डर से नहीं, बल्कि फाइलों, दफ्तरों और प्रशासनिक उदासीनता से