विभिन्न संस्कृतियों के संगम का अनुपम उदाहरण है गोंचा महापर्व

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 करीम
जगदलपुर 26. जून मुख्यमंत्री भूपेश बघेल गोंचा जैसे महापर्व को प्रदेश का गौरव बढ़़ाने वाला महापर्व बताया। मुख्यमंत्री ने बस्तर में 6 सौ वर्षों से भी पूर्व से मनाए जा रहे गोंचा महापर्व में रविवार को सिरहासार में बनाए गए गोंचा गुड़ी में आयोजित छप्पन भोग और आरती कार्यक्रम में रायपुर से वर्चुअली शामिल हुए और कहा कि बस्तर का दशहरा और गोंचा पर्व बहुत ही अनूठा है, जो विभिन्न संस्कृतियों के संगम का अनुपम उदाहरण है और इन पर्वों से बस्तर और छत्तीसगढ़ को जाना जाता है। उन्होंने इस अवसर पर बस्तर के इतिहास को समृद्ध बताते हुए यहां के संस्कृति को निराली बताया। उन्होंने कहा कि बस्तर के संस्कृति को समझने के लिए बस्तर को जीना जरुरी है, क्योंकि तभी इसका आनंद लिया जा सकता है। मुख्यमंत्री ने यहां आयोजित किए जाने वाले गोंचा महापर्व को आध्यात्मिक दृष्टि के साथ ही यहां के सांस्कृतिक विकास को समझने के लिए भी महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि बस्तर का इतिहास पुराणों में उल्लेखित दंडकारण्य से जुड़ा हुआ है, जो दंडकारण्य उत्कल, आंध्र और महाराष्ट्र तक विस्तृत था। इसलिए बस्तर की संस्कृति का इतिहास और भूगोल भी काफी लंबा-चैड़ा है।

उन्होंने कहा कि चारों दिशाओं में जो कुछ अच्छा था, उन सभी को बस्तर की स्थानीय संस्कृति ने आत्मसात किया है। इसीलिए यहां की बोली-भाषाओं में ओड़िया, तेलुगु, मराठी, छत्तीसगढ़ी सभी का प्रभाव दिखाई पड़ता है। यहां की परंपराओं में आसपास की और भी परंपराएं इस तरह घुली-मिली हैं कि अलग-अलग पहचान कर पाना मुश्किल है। मुख्यमंत्री ने कहा कि गोंचा महापर्व का इतिहास 616 वर्षों से भी पुराना है। यह 360 घर आरण्यक ब्राह्मण समाज के बस्तर आने के इतिहास से जुड़ा हुआ है। ओड़िसा का गुड़िंचा पर्व बस्तर में आकर गोंचा पर्व हो गया। ओड़िसा के ब्राह्मण बस्तर में आकर आरण्यक हो गए। गोंचा और 360 घर ब्राह्मण समाज की बस्तर ही स्थायी पहचान है। बस्तर में जिस अंदाज से गोंचा पर्व मनाया जाता है, वह अंदाज बड़ा ही अनूठा है। भगवान जिस रथ में भ्रमण करते हैं, वह भी बड़ा ही अनूठा है। भगवान को जिस तुपकी से सलामी दी जाती है, वह तुपकी भी अनूठी है, उस तुपकी में इस्तेमाल किए जाने वाली गोली यानी फल भी अनूठा है। बड़ा ही अनूठा दृश्य होता है, जब भगवान यात्रा पर निकलते हैं और चारों तरफ तुपकी की आवाज गूंज रही होती है। बस्तर के गांव और शहर के लोग, बस्तर के आदिवासी, भगवान के साथ-साथ चल रहे होते हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि मैं जब छत्तीसगढ़ की संस्कृति को बचाने की बात कहता हूं, तो प्रदेश की इसी समरसता और सरसता को बचाए रखने की बात कहता हूं। हमारी संस्कृति की ये अनूठी परंपराएं हमारे भीतर के इंसान को जिंदा रखती हैं। ये परंपराएं हमारे दिलों की नमी को बनाए रखती हैं। हमारे देव, हमारी देवगुड़ियां, हमारी मातागुड़ियां केवल आध्यात्मिक महत्व के स्थान नहीं है। ये स्थान हमारे मूल्यों से जुड़े हुए हैं। इसीलिए हमारी सरकार इन स्थानों को सहेजने और संवारने का काम कर रही है। हमारे प्रदेश के गांव-गांव में स्थानीय तीज-त्यौहार अलग-अलग अंदाज में मनाए जाते हैं। तरह-तरह की परंपराएं हैं। इन सभी को जिंदा रखना जरूरी है। आदिवासी परब सम्मान निधि योजना और छत्तीसगढ़ी पर्व सम्मान निधि योजना की शुरुआत इसी उद्देश्य से की गई है। इस योजना के अंतर्गत ग्राम पंचायतों को हर साल 10 हजार रुपए दिए जाने का प्रावधान है। हमारे पुरखों ने हम तक तीज-त्यौहारों के माध्यम से अपनी शिक्षा और संस्कारों को पहुंचाया है। हमने तीजा-पोला, हरेली, छेरछेरा, कर्मा जयंती, विश्व आदिवासी दिवस और छठ पर्व पर सार्वजनिक अवकाश इसीलिए शुरू किए हैं, ताकि नयी पीढ़ी भी अपनी संस्कृति से अच्छी तरह परिचित हो पाए। मुख्यमंत्री ने कहा कि हमारी संस्कृति और परंपराओं से पूरी दुनिया को अवगत कराने के लिए राष्ट्रीय आदिवासी नृत्य महोत्सव की शुरुआत की गई है। अपनी खेल संस्कृति को बचाए रखने के लिए हमने छत्तीसगढ़िया ओलंपिक के आयोजन की शुरुआत की है। राम वन गमन पर्यटन परिपथ परियोजना के माध्यम से हम उत्तर से लेकर दक्षिण तक भगवान राम के वनवास से जुड़े स्थलों को चिन्हित करके उन्हें पर्यटन तीर्थों के रूप में विकसित कर रहे हैं। इनमें जगदलपुर और सुकमा जिले का रामाराम भी शामिल है। हमने चंदखुरी में कौशल्या महोत्सव के आयोजन की शुरुआत की है। हाल ही में हमने रायगढ़ में राष्ट्रीय रामायण महोत्सव का आयोजन किया। इसमें विदेशों की रामलीला मंडलियों ने भी भाग लिया। बस्तर का दशहरा और यहां का यह गोंचा पर्व पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। छत्तीसगढ़ की ऐसी ही परंपराएं हमें गौरवान्वित करती हैं, पूरी दुनिया में हमारा मान-सम्मान बढ़ाती हैं, साथ ही हमें अलग पहचान देती हैं।
मुख्यमंत्री ने आरण्यक ब्राह्मण समाज को बधाई देते हुए कहा कि समाज के लोगों ने बस्तर की इस अनूठी परंपरा को सहेज कर रखा है और पूरे मनोयोग के साथ इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हंै। उन्होंने इस परंपरा में अनूठे रंग घोलने वाले बस्तर के सभी नागरिकों को भी बधाई दी। इस अवसर पर स्वास्थ्य मंत्री श्री टी एस सिंहदेव, बस्तर क्षेत्र आदिवासी विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष श्री लखेश्वर बघेल, संसदीय सचिव श्री रेखचंद जैन, हस्तशिल्प विकास बोर्ड के अध्यक्ष श्री चंदन कश्यप, चित्रकोट विधायक श्री राजमन बेंजाम, क्रेडा अध्यक्ष श्री मिथिलेश स्वर्णकार, मछुआ कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष श्री एमआर निषाद, इंद्रावती बेसिन विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष श्री राजीव शर्मा, महापौर श्रीमती सफीरा साहू, नगर निगम सभापति श्रीमती कविता साहू, कलेक्टर श्री विजय दयाराम के, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक श्री जितेन्द्र मीणा सहित जनप्रतिनिधिगण, 360 आरण्यक ब्राह्मण समाज के पदाधिकारी एवं सदस्य, गोंचा आयोजन समिति के सदस्य सहित नागरिकगण उपस्थित थे। सामाजिक भवन हेतु दिए गए पट्टे इस अवसर पर चडार बुनकर समाज, मां छिंदवाली श्री महाकाली सेवा समिति, कान्यकुब्ज वैश्य भुंजवा समाज, क्षत्रिय महासभा समाज को सामाजिक भवन निर्माण हेतु आबंटित भूमि का पट्टा प्रदान किया गया। भवन निर्माण हेतु मुख्यमंत्री द्वारा 50 लाख रुपए प्रदान करने पर आरण्यक ब्राह्मण समाज ने मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल के प्रति आभार व्यक्त किया। वहीं समाज प्रमुखों द्वारा भी भूमि का पट्टा प्रदान करने पर मुख्यमंत्री के प्रति आभार जताया

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