25 मार्च पुण्यतिथि पर विशेष 

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जगदलपुर 24 मार्च . बस्तर में चालुक्यवंश के इतिहास से यह बात स्पष्ट है कि 1302 से लेकर बस्तर में चालुक्य साम्राज्य की स्थापना की थी तब से लेकर 1947 तक विलय काल तक एक ही साम्राज्य था जो कभी परतंत्र नहीं हुआ अथवा गुलाम नहीं हुआ। 1921 में महाराजा रुद्रप्रताप देव की स्वाभाविक मृत्यु ने अस्वाभाविक परिणाम उत्पन्न किया। प्रफुल्ल कुमारी देवी को इस महाराजा की इच्छा के विरुद्ध तथा कतिपय विरोधों के बावजूद भी ब्रितानी प्रशासन ने केवल अपनी सोची समझी नीति शैशव शासन की आड़ में स्वतंत्रता के आदांेलन के विरुद्ध अपनी दमनकारी नीतियों को चलाने के लिए बस्तर के सिंहासन पर बैठाकर मान्यता दे दी। महारानी प्रफुल्ल कुमारी ने वर्ष 1928 में मयूरभंज के रियासत के राजकुमार प्रफुल्ल चंद्र भंजदेव से विवाह कर लिया। इस विवाह के साथ ही संपूर्ण वयस्क घोषित कर विवेकाधिकार दे दिया गया और इस अधिकार के साथ ही इस महारानी ने संपूर्ण सत्ता अपने हाथों में ले ली तब ब्रितानी प्रशासन ने इस महारानी को केवल निरीह समझता था। 25 जून 1929 को प्रवीर के जन्म के बाद अपने पति के संपूर्ण प्रभाव में आ चुकी थी। बावजूद बस्तर में चालुक्य वंश साम्राज्य को बनाए रखने के लिए प्रवीर को चालुक्य वंश में हिंदू रीति रिवाजों के अनुसार गोद ले लिया था।
माता के लंदन में संदेहास्पद स्थिति में मृत्यु के बाद मात्र 7 वर्ष की आयु में ही बस्तर के राजगद्दी के लिए राजतिलक हुआ। प्रवीर चंद्र भंजदेव का जन्म 29 जून 1929 को शिलांग दार्जिलिंग में हुआ था। वे बस्तर की स्वर्गीया महारानी प्रफुल्ल कुमारी देवी की दूसरी संतान थे। इन्होंने 1936 से लेकर 1947 तक बस्तर में राज किया। प्रवीर का छात्र जीवन योग्यता की आभास से आलोकित था। उन्होंने लंदन, इन्दौर, कलकत्ता, देहरादून और रायपुर के राजकुमार कालेज में शिक्षा ग्रहण की। इतिहास तथा भूगोल मंे विशेष प्रावीण्य का प्रमाण पत्र उन्होंने पाया था।
माता के निधन के बाद तथा पिता को अनेक तरह से प्रताड़ित किया गया। उन्हें अपने पुत्र से ही मिलने नहीं दिया जाता था, कारण था कि प्रफुल्ल कुमारी के निधन के बाद प्रफुल्ल चंद्र भंजदेव ने एक अनुबंध पत्र में हस्ताक्षर नहीं किया था जो अंग्रेजों को नागवार गुजरा। बाद में प्रफुल्ल चंद्र भंजदेव को राज्य से निष्कासित कर दिया गया। इस तरह प्रवीर चंद्र भंजदेव के सिर से माता का साया उठ गया था तथा बाल्यकाल में पिता के प्यार से भी वंचित हो गये। ऐसे में अंग्रेजों ने प्रवीर चंद्र भंजदेव की परवरिस करने के लिए ग्रिब्सन नामक दम्पत्ति गार्डरन के लिए रखा गया। ये इंग्लोइंडियन गार्डनर ने जैसा चाहा वैसा ही परवरिश किया। जब वे वयस्क हुए तब प्रवीरचंद्र जुलाई 1946 में अपनी माता के गद्दी का उत्तराधिकारी बना, चूंकि उनके पिता अन्य भंजवंश के थे बावजूद अन्य वंश को स्वीकार करना संभवतः कोई नीजि कारण रहे होंगे। सत्ता में आते ही उन्होंने सारे कार्य आदिम समुदाय के विकास के लिए किए। बस्तर के अदालतों ने एक काले कानून ‘हार्डिंग एक्ट’ के तहत बस्तर के आदिम समुदाय पर 80 हजार रुपये के अनाज और नकद जुर्माना किया था। आदिवासियों के राजा के रुप में सत्ता प्राप्त करते ही इस राजा ने उक्त कानून को तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दिया था, साथ ही बस्तर के विकास के लिए उसने अनेक परियोजनाएं बनाई थी।
प्रवीरचंद्र भंजदेव के बहुत कुछ चाहने के बावजूद वे कुछ नहीं कर पाए। वे चंद महीनों के ही अधिकार प्राप्त राजा बने किन्तु उन्हें इस बात का मलाल रह गया कि वे बस्तर की जनता के लिए कुछ नहीं कर पाए। विलिनीकरण के बाद भी वे आदिवासियों के मसीहा बने रहें, उनके दिलों में राज करते रहे, भले ही सत्ता न थी किन्तु वे बिना राज्य के राजा बने रहे। आदिवासियों के प्रति उनके मन में अपार दया की भावना थी। वे अपने राजधानी के समीप आदिवासियों में सहकारिता की भावना उत्पन्न करने की दृष्टि से छोटे-छोटे गांव बसाया। आज जगदलपुर के समीप जो गांव बसे हैं वह महाराजा प्रवीर की देन है। कहा जाता है कि प्रवीरचंद्र को कुछ वर्षों तक राज्य करने का अवसर मिलता तो निश्चित तौर पर बस्तर को भारत का स्वर्ग बना देते।

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