छत्तीसगढ़ की राजकीय पक्षी ” बस्तर की पहाड़ी मैना”

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जगदलपुर, 14 दिसंबर। एस. करीमुद्दीन, छत्तीसगढ़ की राजकीय पक्षी है पहाड़ी मैना। पहाड़ी मैना बस्तर में पायी जाती है। बस्तर जिले के कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान में अब यह पक्षी बहुतायात में देखने को मिल रही है। छत्तीसगढ़ की राजकीय पक्षी बस्तर पहाड़ी मैना, चमकदार काले रंग की होती है और इसके पैर व चोंच नारंगी कलर की होती है एवं इसके गर्दन पर पीलपन लिए हुए नारंगी रंग की पट्टी कलगी होती है, जो इस पक्षी की सुन्दरता में चार चांद लगाती है। बस्तर पहाड़ी मैना बहुत ही सुन्दर, आकर्षक एवं संवेदनशील होती है। यह स्वच्छता पसंद पक्षी है, तथा घने जंगल में साल के ऊंचे-ऊंचे पेड़ों पर बैठना इसे बहुत पसंद है। इस पक्षी की खॉस बात यह है कि यह कई प्रकार की आवाज भी निकालती है। पहाड़ी मैना आदमी की तरह हूबहू आवाज भी निकालती है और मनुष्यों के संपर्क के आने के बाद ये बातें भी करती है। जिसके कारण तोते की तरह लोग इसे भी पिंजरे में कैद कर पालने लगे थे। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद वर्ष 2002 में इसे छत्तीसगढ़ की राजकीय पक्षी घोषित किया गया।
बस्तर के ग्रामीण इस पक्षी की शिकार कर मारते व खाते भी थे। ग्रामीणों ने दूरदर्शन समाचार से चर्चा करते हुए कहा कि पहले ग्रामीण पहाड़ी मैना को मारने के लिए गुलेल, पत्थर व धनुष बाण का उपयोग करने के साथ-साथ कई बार इनके फलों में हल्का जहर भी मिला देते थे। पहाड़ी मैना को शिकार करने के बाद व उसे बड़े चाव से खाते थे। इस बीच अगर पहाड़ी मैना जीवित पकड़ में आ जाती थी तो वे इसे बेच कर पैसा कमाते थे। चूंकि पहाड़ी मैना, मनुष्य की आवाज निकालती है और प्रशिक्षण के बाद मनुष्यों से वे बातें भी करती है, इसलिए इसकी तस्करी करने पर ग्रामीणों को काफी ऊंचे दाम मिलते थे। इन सभी कारणों से पहाड़ी मैना की संख्या में कमी होने व कलांतर में दुर्लभ होने लगी।
पहाड़ी मैना जब विलुप्तता के कगार पहुंच गई, तब इसकी संरक्षण व संर्वधन के लिए सरकार ने कई योजनाएं चलाई। जिसमें से एक योजना बस्तर के संभागीय मुख्यालय जगदलपुर स्थित वनविद्यालय में साल के एक विशाल पेड़ को जॉलिदार मोटे तारों से घेरबंदी कर उसे पिंजरा का रूप दे दिया गया और उसमें चार पहाड़ी मैना को बंद कर उसकी संरक्षण एवं संवर्धन के लिए दशकों तक योजना चलाई और लाखों रूपए फूंक दिए, लेकिन यह योजना पूरी तरह फैल हो गई। दशकों तक चलाई इस योजना से पहाड़ी मैना की संख्या में वृद्धि होना तो दूर, विभाग ने पिंजरे में बंद चारों पहाड़ी मैना का लिंग तक पता नहीं कर पाए कि इनमें से कितने नर है और कितने मादा।
लेकिन लगभग पिछले डेढ़-दो साल में पहाड़ी मैना के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए एक अन्य योजना की शुरूआत की। इस योजना के संबंध में कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान के संचालक धम्मशील गणवीर ने बताया कि श्श्कैम्पा परियोजनाष् के अंतर्गत बस्तर पहाड़ी मैना के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए जो योजना संचालित की जा रही है उसके तहत कांगेर घाटी क्षेत्र के ग्रामीण युवाओं को मैना मित्र बनाकर उसे प्रशिक्षण दिए, उसके बाद इन मैना मित्रों की मदद से ग्रामीणों को पहाड़ी मैना के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए जागरूक किया। यह योजना सफल हो रही है, जिसके कारण कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र में अब पहाड़ी मैना काफी संख्या में झुण्डों में दिखाई देने लगे हैं।
कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान के संचालक श्री गणवीर का कहना है कि चूंकि पहाड़ी मैना छत्तीसगढ़ की राजकीय पक्षी है और यह घने जंगलों में ऊंचे-ऊंचे पेड़ों पर स्वच्छंदता पूर्वक रहती है। उन्होंने सभी पक्षी प्रेमियों से अपील करते हुए कहा है कि पहाड़ी मैना को पिंजरे में कैद कर न रखें।
इस संबंध में बस्तर पहाड़ी मैना के संरक्षण एवं संर्वधन पर काम कर रहे सीनियर शोधार्थी युगल जोशी बताते हैं कि छत्तीसगढ़ की राजकीय पक्षी पहाड़ी मैना की संख्या बहुत ही कम थी, यह पक्षी विलुप्तता के कगार पर पहुंच गई थी। तो इसके संरक्षण एवं संवर्धन के लिए सबसे पहले पहाड़ी मैना की प्रकृति अर्थात उसके रहन-सहन, खान-पान और उसके आसपास के वातावरण जानने व पहचाने का काम शुरू किया। इससे हमें पता चला कि घने जंगलों में साल के ऊंचे-ऊंचे पेड़ों पर रहना व इसमें बैठना पहाड़ी मैना को खूब पसंद है। यह पक्षी शाकाहार एवं मांसाहार दोनों प्रकार के भोजन करती है। शाकाहार में ये मुख्य रूप से तेजम, पीपल, बरगद सहित बेर प्रजाति के फलों को बड़े ही चॉव के साथ खाते है और मांसाहार में कीड़े-मकोड़े, दीमक की चीटियां तथा टिड्डा खाना इसे बहुत पसंद है। पहाड़ी मैना काफी स्वच्छता पसंद पक्षी है। यह फल खाने के बाद साल के ऊंचे-ऊंचे पेड़ों पर बैठकर खुद को अपने पंख व चोंच की मदद से साफ करती है। अपने रिसर्च में श्री जोशी ने यह भी पाया कि बस्तर पहाड़ी मैना अपने जोड़ी के साथ ही रहते है। ये पक्षी इतने वफादार है कि एक बार इनकी जोड़ी बन जाती है तो फिर आजीवन इसे निभाते है, वे दूसरी जोड़ी नहीं बनाते। किसी भी कारण से जोड़ी में से किसी एक पहाड़ी मैना की मृत्यु हो जाती है तो भी वे किसी दूसरे पहाड़ी मैना से मेटिंग नहीं करते। चाहे वह नर हो या मादा। पहाड़ी मैना की संख्या में कमी होने का यह भी एक प्रमुख कारण है।
पहाड़ी मैना साल के सुखे पेड़ो की खोह में रहते है। कठफोड़वा पक्षी द्वारा साल के सुखे पेड़ों को खोह कर दिया जाता है, उसी खोह में पहाड़ी मैना अपना आशियाना बनाते है। शोध के मुताबिक पहाड़ी मैना मानसून के शुरूआती दौर में अपने जोड़ी के साथ मेटिंग करते है और इसके बाद ये वर्षाऋतु में ही अंडा देती है और ठंड के मौसम में इनके बच्चे उडना सीखती है इसलिए ठंड के मौसम में कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान में पहाड़ी मैना झुण्डों में दिखाई देती है। पिछले डेढ़ से दो वर्षों में कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र में पहाड़ी मैना की संख्या में जो बढ़ोत्तरी दिख रही है, उसमें क्षेत्र मैना मित्रों की भूमिका प्रशंसनीय है।
कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र के गांवों से करीब 11 मैना मित्रों की नियुक्ति विभाग द्वारा की गई है। ये मैना मित्र ग्रामीणों को पक्षियों के संबंध में जानकारी देते है और खॉसकर क्षेत्र के स्कूलों में प्रत्येक शनिवार को जाकर विद्यार्थियों को पहाड़ी मैना के बारे में जानकारी देते हुए जागरूक करते है और रविवार को जंगल ले जाकर दूरबिन के माध्यम से पहाड़ी मैना सहित अन्य पक्षियों का दर्शन व पहचान करवाते है।
मैना मित्र रायघर नाग ने बताया कि पहले बस्तर पहाड़ी मैना का शिकार ग्रामीणों द्वारा करने के कारण यहां उसकी संख्या बहुत ही कम हो गई थी। लेकिन पिछले पिछले डेढ-दो साल में यहां इसकी संख्या में काफी बढ़ोत्तरी हुई है। अब ये झुण्डों में भी यहां दिखाई देते है। उन्होंने बताया कि कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र में पहाड़ी मैना सहित करीब 211 प्रकार की पक्षियां पायी है। जिसमें से 186 प्रकार के पक्षियों को वे सिर्फ आवाज से ही पहचान लेता है कि वे कौन सी पक्षी है।
बाईट
धम्मशील गणवीर, संचालक कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान
बस्तर पहाड़ी मैना छत्तीसगढ़ राज्य का राजकीय पक्षी है। पिछले कई वर्षों से इसकी संख्या में कमी होती जा रही थी। इसके मद्वेनजर पिछले दो साल से कैम्पा परियोजना अंतर्गत इसके संरक्षण का कार्य किया जा रहा है। इसके तहत कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र के आसपास के ग्रामीण युवाओं को मैना मित्र के रूप रखा। मैना मित्र के माध्यम से पहाड़ी मैना की संरक्षण व संवर्धन के लिए जो कार्य किए है उसकी सकारात्क परिणाम देखने को मिल रही है। कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र के लगभग 15 गांवों में पहाड़ी मैना साईटिंग हो रही है, जो अच्छी बात है। एक समय जब मैना के संक्षरण एवं संवर्धन के लिए कार्य किए जा रहे थे लेकिन किसी कारणवश उसमें सफलता नहीं मिल रही थी। परन्तु इस प्रयास से अब सफलता मिल रही है। इस संरक्षण परियोजना अंतर्गत ग्रामीण युवाओं मैना मित्र के रूप में रखा है। पहाड़ी मैना के साथ-साथ अन्य पक्षियों को पहचानने की प्रशिक्षण भी उन्हें दिया गया है और ये मैना मित्र 100 से अधिक पक्षियों को पहचानने लगे हैं। इससे इन ग्रामीण युवाओं को एक रोजगार का भी अवसर मिला है, इसके माध्यम से वे भविष्य में नेचर गाईड बन सकते है, इन्हे इक्को टूरिज्म में भी रोजगार उपलब्ध करवा रहे हैं। इक्को टूरिज्म के तहत होम स्टे संचालकों को पहाड़ी मैना के संरक्षण के जागरूक किया गया है।
युगल जोशी, शोधार्थी (पहाड़ी मैना संरक्षण एवं संवर्धन)
पहाड़ी मैना के संरक्षण एवं संवर्धन के तहत सबसे पहले इसकी संख्या में होने वाली कमी के कारणों की पहचान किए। पहाड़ी मैना सूखे साल के खोह में रहते है। सूखे पेड़ो पर कठफोड़वा पक्षी खोह करते है, इसलिए कठफोड़वा पक्षी का भी यहां पर काफी महत्व है। इसके साथ ही पहाड़ी मैना के भोजनों में बरगद का फल, पीपल व तेजम फल सहित बेर प्रजाति के फलदार पेड़ों का भी यहां संरक्षित रखने के साथ-साथ उनके घोषलों का सतत निगरानी रखने लगे। चूंकि पहाड़ी मैना स्वच्छंद और ऊंचे वृक्षों पर रहना पसंद करती है। पिंजरेनुमा एक क्षेत्र में कैद कर इसके संवर्धन की कल्पना बेमानी है। इनके पसंदीदा वातावरण में ही इसके संवर्धन के लिए काम करने से पिछले डेढ़ साल में इसकी संख्या में बढ़ोत्तरी देखने को मिल रही है। मैना मित्र के रूप में कांगेर घाटी उद्यान क्षेत्र के आस पास के युवाओं को ही नियुक्त किया गया है। ये लगातार पहाड़ी मैना के रिहायसी क्षेत्रों व उनकी घोषलों की सतत निगरानी करते है। इससे हमे पहाड़ी मैना के आचरण के बारे में भी जानकारी मिल रही है, जिससे हमें आगामी समय में इसके लिए योजनाएं बनाने में आसानी होगी।
रायधर नाग, मैना मित्र
पहाड़ी मैना विलुप्पतता के कगार पर पहुंच गई थी, मैना के संरक्षण व संवर्धन योजना के तहत जंगल में पहाड़ी मैना की निगरानी के लिए हमारी नियुक्ति की गई है। पहाड़ी मैना साल के सुखे पेड़ों की खोह में अपना घोषला बनाते है। गांवों के आस-पास जब यह पक्षी फल खाने जाते थे तो ग्रामीण पहले गुलेल व पत्थर मारकर इसकी हत्या कर देते थे। इसे रोकने एवं संवर्धन के लिए हमारी नियुक्ति किए है। पक्षियों को पहचाने के लिए हमें प्रशिक्षण भी दिया गया। मर्लिन एप्प के माध्यम से बहुत सी पक्षियों की पहचान हो गई है एवं आवाज के माध्यम से अब हम पक्षी की पहचान लेते है कि वह कौन सी पक्षी है। फल खाने के बाद पहाड़ी मैना सुखे पेड़ पर बैठकर पंख सजाना, पीठ खुजाना करती है। गर्मी के समय नदी किनारे के सुखे पेड़ों पर ज्यादा दिखती है। पहाड़ी मैना ठंड के मौसम में कन्नूट फल (अमरबेल फल) खाने झुण्डों में आते है।
समलू राम नाग, मैना मित्र (निवासी कोटमसर)
करीब पांच छरू साल पहले यहां पहाड़ी मैना दिखाई नहीं देती थी, लेकिन अब पिछले डेढ-दो सालों में कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र में यह झुण्डों में दिखाई देती है। पहाड़ी मैना के संरक्षण अभियान से जुडने के बाद हमें पक्षियों के पहचानने की ट्रेनिंग दिया गया। इस प्रशिक्षण के बाद हमें पक्षियों को पहचानने में काफी आसान होने लगी। इसी तरह मध्यप्रदेश के संजय डुबरी में हुई बर्ड सर्वे में जाने का मौका भी मिला, वहां पर मैने कई प्रकार के पक्षियों की पहचान की। श्री गणवीर सर के द्वारा हमें पक्षियों को पहचानने की ट्रेनिंग दिये जाने का हमें बहुत फायदा मिला। अब हम आवाज के ही माध्यम से पक्षियों को पहचान जाते हैं कि वह कौन सी पक्षी है। पहले जब बेरोजगार थे तो हम लोग पहाड़ी मैना व अन्य पक्षियों का शिकार भी करते थे, लेकिन पिछले डेढ साल से यहां पर अब शिकार बंद हो गया है। अब हम लोग ही गांवों में लोगों को पहाड़ी मैना की शिकार नहीं करने के लिए कह रहे हैं और लोग जागरूक भी हो रहे हैं और इसकी शिकार नहीं कर रहे हैं।
रायधर बघेल (स्कूली छात्र) निवासी ग्राम नागलसर
प्रत्येक शनिवार को स्कूल की छुट्टी होने के बाद भैया लोग हमको पक्षी दर्शन कराने के लिए जंगल ले जाते है। जंगल में हमें दूरबिन के माध्यम से पक्षी दर्शन करवाते हैं। जंगल में पहाड़ी मैना, पंडकी, रामी मैना, बाज, सहित कई प्रकार के पक्षी दिखाते हैं। पहले पहाड़ी मैना दिखाई नहीं देते थे, लेकिन अब बहुत दिखाई देते हैं और हमें भैया लोग पहाड़ी मैना को मारने के लिए मना किया गया है। इसलिए झुण्डों में भी पहाड़ी मैना दिखाई देते हैं।
लेखन नाग (मैना मित्र) निवासी ग्राम नागलसर


मैं दो साल से यहां पर मैना मित्र के रूप में काम कर रहा हूं। प्रत्येक शनिवार को स्कूल में छात्रों को राजकीय पक्षी पहाड़ी मैना व अन्य पक्षियों के बारे में जानकारी देता हूं और प्रत्येक रविवार को जंगल ले जाकर बच्चों को पक्षी दर्शन करवाता हूं। छात्रों को पक्षियों के साथ-साथ वन्य प्राणियों के बारे में भी जानकारी देता हूं। वन्य जीव जन्तु का शिकार नहीं करने के लिए बच्चों के साथ साथ ग्रामीणों को भी जागरूक करता हूं। पहाड़ी मैना पहले बहुत कम थी, दिखाई नहीं देती थी। लेकिन अब इनकी संख्या में काफी बढ़ोत्तरी हुई है। पिछले वर्ष मैने 187 पहाड़ी मैना का झुण्ड देखा था।
सहदेव नाग, ग्रामीण। ग्राम पुलचा
बस्तर पहाड़ी मैना पहले दिखाई नहीं देता था, पिछले दो साल से ग्राम पुलचा के फलदार पेड़ों में आकर पहाड़ी बैठती है और फल खाकर उड़ जाती है। पहले मै पहाड़ी मैना देखा नहीं था दो साल से ही दिखाई दे रही है। पहले हमें मालूम नहीं था, हमारे पूर्वज पहले पशु पक्षियों की शिकार करते थे और उसे मारकर खाते थे। इसलिए इसकी संख्या खत्म हो रही थी, लेकिन अब लोग शिक्षित व जागरूक हो रहे है तो शिकार करना बंद कर दिए इसलिए अब पहाड़ी मैना यहां दिखाई देती है, कई बार झुण्डों में भी ये फल खाने आती है फिर खाकर उड़ जाती है।
सुखमन नाग ग्रामीण ग्राम पुलचा
पहले यहां पहाड़ी मैना दिखाई नहीं देते थे। पहाड़ी मैना का पहले गांव के लोग शिकार करते थे। गुलेल व पत्थर से उसे मारने के अलावा बुर्जुग लोग पहले फल में हल्का जहर भी मिला देते थे, जिसे खाकर वे बेहोश हो जाते थे फिर उसे मारकर खाते थे। लेकिन अब गांव वाले जागरूक हो गए है। अब पहाड़ी मैना को नहीं मारते। चार बजे यहां फल खाने आते है तो हम सब उसे देखते है, फल खाने के बाद वे उड़ जाती है।

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